लद्दाख, हिमाचल प्रदेश और अरुणाचल प्रदेश की बर्फीली पहाड़ियों पर उगने वाला सी बकथॉर्न (Hippophae rhamnoides) आज दुनिया भर के वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और कृषि विशेषज्ञों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इसे ‘हिमालय का सोना’, ‘वंडर बेरी’ और ‘सुपरफूड ऑफ द माउंटेन्स’ जैसे नामों से पुकारा जाता है। लेकिन यह महज एक फल नहीं — यह एक संपूर्ण औषधालय है।
1. सी बकथॉर्न (Sea Buckthorn) क्या है?
Sea Buckthorn: सी बकथॉर्न एक कांटेदार झाड़ी है जो मुख्यतः ठंडे और शुष्क पहाड़ी क्षेत्रों में पाई जाती है। इसका वैज्ञानिक नाम Hippophae rhamnoides है। यह पौधा Elaeagnaceae परिवार से संबंधित है। इसके छोटे-छोटे नारंगी-पीले रंग के फल विटामिन C, ओमेगा फैटी एसिड, कैरोटिनॉइड और फ्लेवोनॉइड से भरपूर होते हैं।
भारत में यह पौधा मुख्यतः लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में पाया जाता है। समुद्र तल से 3,000 से 5,000 मीटर की ऊंचाई पर भी यह पौधा बिना किसी विशेष देखभाल के उगता है – यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।
स्थानीय नाम
- लद्दाखी भाषा में: ‘छुरपुन’ (Churpun)
- तिब्बती भाषा में: ‘तसेरू’ (Tseru)
- हिंदी में: ‘धारू’ या ‘अमलखड़ा’
- अंग्रेजी में: Sea Buckthorn / Sandthorn / Seaberry
2. पोषण का खजाना – क्या-क्या मिलता है इसमें?
सी बकथॉर्न को ‘पोषण का राजा’ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसमें 190 से अधिक जैव-सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं जो इसे दुनिया के सबसे पोषक फलों में से एक बनाते हैं।
प्रमुख पोषक तत्व (प्रति 100 ग्राम फल में)
- विटामिन C: 400–2000 mg (संतरे से 10-15 गुना अधिक)
- विटामिन E (टोकोफेरॉल और टोकोट्रिएनॉल): प्रचुर मात्रा में
- विटामिन A (बीटा-कैरोटीन): दृष्टि और त्वचा के लिए अत्यंत लाभकारी
- विटामिन B1, B2, B6, B12, K: संपूर्ण बी-कॉम्प्लेक्स
- ओमेगा-3, ओमेगा-6, ओमेगा-7, ओमेगा-9 फैटी एसिड
- फ्लेवोनॉइड्स: क्वेर्सेटिन, केम्पफेरॉल, रुटिन
- खनिज: आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम, पोटैशियम, जिंक
- अमीनो एसिड: 18 प्रकार के आवश्यक और गैर-आवश्यक
विशेष तथ्य: सी बकथॉर्न उन बहुत कम पौधों में से एक है जिसमें ओमेगा-7 (पाल्मिटोलेइक एसिड) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह फैटी एसिड त्वचा, श्लेष्म झिल्ली और पाचन तंत्र के लिए असाधारण रूप से फायदेमंद है।
3. औषधीय गुण – प्रकृति की चिकित्सा
आयुर्वेद और पारंपरिक तिब्बती चिकित्सा में सी बकथॉर्न का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। आधुनिक विज्ञान ने भी इसके कई दावों को प्रमाणित किया है।
हृदय स्वास्थ्य
सी बकथॉर्न में मौजूद ओमेगा फैटी एसिड, फ्लेवोनॉइड और विटामिन E हृदय की मांसपेशियों को मजबूत करते हैं। यह कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करता है, रक्तचाप सामान्य रखता है और एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों में रुकावट) को रोकने में सहायक है। शोधों से पता चला है कि नियमित सेवन से हृदयाघात का जोखिम काफी कम हो जाता है।
प्रतिरोधक क्षमता
इसमें मौजूद उच्च विटामिन C और एंटीऑक्सीडेंट शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। सर्दी-जुकाम, फ्लू और संक्रमणों से बचाव में यह अत्यंत प्रभावी है। COVID-19 के बाद से भारत में इसकी मांग कई गुना बढ़ गई है।
त्वचा और बालों के लिए
सी बकथॉर्न तेल त्वचा की कोशिकाओं को पुनर्जीवित करता है। झुर्रियां, दाग-धब्बे, एक्जिमा, सोरायसिस और जलन में यह राहत देता है। बालों की जड़ों को पोषण देकर यह बालों का झड़ना रोकता है और नए बालों को उगने में मदद करता है। कॉस्मेटिक उद्योग में सी बकथॉर्न तेल की भारी मांग है।
पाचन तंत्र
गैस्ट्रिक अल्सर, एसिडिटी और आंतों की सूजन में सी बकथॉर्न का तेल और जूस अत्यंत लाभकारी है। यह आंत की दीवारों को ठीक करता है और पाचन प्रक्रिया को सुगम बनाता है।
मधुमेह और लीवर
शोधों से पता चला है कि सी बकथॉर्न रक्त शर्करा को नियंत्रित करने में सहायक है। यह लीवर को डिटॉक्सीफाई करता है और फैटी लीवर की स्थिति में सुधार लाता है।
कैंसर-रोधी गुण
प्रारंभिक शोधों में सी बकथॉर्न के अर्क में एंटी-ट्यूमर गुण पाए गए हैं। इसमें मौजूद फ्लेवोनॉइड्स और कैरोटिनॉइड्स मुक्त कणों (free radicals) को नष्ट करते हैं जो कैंसर कोशिकाओं के विकास को प्रोत्साहित करते हैं।
4. भारतीय अर्थव्यवस्था में सी बकथॉर्न की भूमिका
भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें सी बकथॉर्न को एक महत्वपूर्ण आर्थिक फसल के रूप में बढ़ावा दे रही हैं। DRDO (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) ने लद्दाख में इसकी खेती का बड़े पैमाने पर विस्तार किया है।
DRDO की पहल
DRDO के लेह स्थित DIHAR (Defence Institute of High Altitude Research) ने सी बकथॉर्न की उन्नत किस्में विकसित की हैं जो अधिक उपज देती हैं। DRDO ने इससे जूस, तेल, कैप्सूल और अन्य उत्पाद बनाने की तकनीक विकसित की है जो अब किसानों को हस्तांतरित की जा रही है।
आर्थिक संभावनाएं
- वैश्विक सी बकथॉर्न बाजार 2025 में लगभग 300 मिलियन डॉलर का है और 2030 तक 500 मिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है।
- भारत में लद्दाख में अकेले 40,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि पर यह प्राकृतिक रूप से उगता है।
- एक हेक्टेयर से किसान 3-5 लाख रुपये वार्षिक कमा सकता है।
- स्थानीय महिला स्वयं सहायता समूह इससे जैम, जूस, साबुन और क्रीम बनाकर आजीविका कमा रहे हैं।
- निर्यात के लिए जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका के खरीदार सक्रिय रूप से संपर्क में हैं।
सफलता की कहानी: लद्दाख की स्पितुक गांव की महिला किसान डोलमा ने सी बकथॉर्न की खेती शुरू की और आज वह अपने उत्पाद दिल्ली और मुंबई के जैविक बाजारों में बेचती हैं। उनकी वार्षिक आय पांच गुना बढ़ गई है।
5. पर्यावरणीय महत्व
सी बकथॉर्न केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- भूमि कटाव रोकना: इसकी गहरी जड़ें मिट्टी को बांधती हैं और भूस्खलन रोकती हैं।
- नाइट्रोजन स्थिरीकरण: यह पौधा वायुमंडलीय नाइट्रोजन को मिट्टी में स्थिर करता है, जिससे आसपास की मिट्टी उर्वर होती है।
- जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशील: अत्यधिक ठंड, सूखा और खराब मिट्टी में भी यह जीवित रहता है।
- वन्यजीव आश्रय: इसके घने कांटेदार जंगल छोटे जानवरों और पक्षियों को आश्रय देते हैं।
- मरुस्थलीकरण रोकथाम: चीन ने गोबी रेगिस्तान के विस्तार को रोकने के लिए लाखों सी बकथॉर्न पौधे लगाए हैं।
6. उत्पाद और उपयोग
सी बकथॉर्न का हर भाग उपयोगी है — फल, बीज, पत्तियां, छाल और शाखाएं। इससे बनने वाले प्रमुख उत्पाद हैं:
खाद्य उत्पाद
- सी बकथॉर्न जूस — पोषक पेय के रूप में
- जैम, जेली और मुरब्बा
- वाइन और सिरका
- हर्बल चाय (पत्तियों से)
- एनर्जी ड्रिंक और स्मूदी
औषधीय उत्पाद
- सी बकथॉर्न बीज तेल — कैप्सूल और तरल रूप में
- आयुर्वेदिक अवलेह (हर्बल पेस्ट)
- आंखों की बूंदें (ड्राई आई सिंड्रोम के लिए)
- घाव भरने वाला मरहम
सौंदर्य उत्पाद
- फेस सीरम और मॉइस्चराइजर
- एंटी-एजिंग क्रीम
- हेयर ऑयल और शैंपू
- सनस्क्रीन और लिप बाम
7. सरकारी योजनाएं और नीतियां
भारत सरकार ने सी बकथॉर्न को राष्ट्रीय महत्व की फसल घोषित किया है। इसके विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं:
- राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) सी बकथॉर्न की खेती के लिए किसानों को 50% तक सब्सिडी दे रहा है।
- DRDO ने उन्नत प्रसंस्करण तकनीक विकसित की है और 20 से अधिक उत्पाद बाजार में उतारे हैं।
- लद्दाख प्रशासन ने ‘Sea Buckthorn Mission’ के तहत 10,000 किसानों को प्रशिक्षण दिया है।
- GI (Geographical Indication) टैग के लिए आवेदन प्रक्रिया चल रही है।
- APEDA (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात विकास प्राधिकरण) इसके निर्यात को बढ़ावा दे रहा है।
8. चुनौतियां
अपार संभावनाओं के बावजूद सी बकथॉर्न क्षेत्र कई चुनौतियों का सामना कर रहा है:
- फसल कटाई कठिन है क्योंकि कांटेदार झाड़ियों से फल तोड़ना श्रमसाध्य है।
- प्रसंस्करण इकाइयों की कमी से किसान कच्चा माल बेचने पर मजबूर हैं।
- ठंडी श्रृंखला (Cold Chain) अवसंरचना का अभाव फल की शेल्फ लाइफ को सीमित करता है।
- जागरूकता की कमी से शहरी उपभोक्ता इसके लाभों से अनजान हैं।
- जलवायु परिवर्तन से पारंपरिक उगाने वाले क्षेत्रों पर खतरा मंडरा रहा है।
लेखक की राय
सी बकथॉर्न सिर्फ एक पौधा नहीं है – यह भारत के पर्वतीय क्षेत्रों की आर्थिक संपन्नता, पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान और पर्यावरण संरक्षण का प्रतीक है। अगर सही नीतियां, आधुनिक प्रसंस्करण और जन-जागरूकता के साथ इसका विकास किया जाए, तो यह ‘हिमालय की सुनहरी बेरी’ भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक नई पहचान दिला सकती है।
जब एक छोटी-सी नारंगी बेरी भूमि कटाव रोक सकती है, किसानों की आमदनी बढ़ा सकती है, बीमारियों से लड़ सकती है और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को पोषण दे सकती है – तो इसे ‘वंडर बेरी’ कहना सचमुच सार्थक है।













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