CM हेमंत सोरेन के कैबिनेट के फैसले के बाद भी, आंदोलनरत छात्र CBI जांच की मांग पर अड़े
Jharkhand Students Protest Legal Advice: JPSC की 11-13वीं परीक्षा और 14वीं PT समेत JSSC CGL परीक्षा रद्द होने पर लंबे समय से चल रहा छात्रों का आंदोलन एक बड़े मोड़ पर पहुंच गया है। राज्य कैबिनेट की बैठक के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्वयं सामने आकर घोषणा की कि जेएसएससी सीजीएल परीक्षा रद्द कर दी गई है। इसके साथ ही एक अन्य परीक्षा को भी निरस्त कर दिया गया है। इस फैसले से अभ्यर्थियों की नौकरी पर सीधा असर पड़ा है, जो पिछले कई महीनों से इन पदों पर कार्यरत थे।
सरकार के इस फैसले के कानूनी और सामाजिक पहलुओं को समझने के लिए पूर्व महाधिवक्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार से बातचीत की गई।
अदालत के आदेश में पहले से थी नियुक्तियां रद्द होने की शर्त
अजीत कुमार के अनुसार, सीजीएल परीक्षा से जुड़ा मामला पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन था। अदालत के आदेश में स्पष्ट किया गया था कि पेपर लीक से जुड़ी एफआईआर की जांच छह महीने के भीतर पूरी की जाएगी। साथ ही यह भी तय था कि जिन 10 अभ्यर्थियों के खिलाफ सबूत मिले थे, उनकी नियुक्ति नहीं होगी, और अगर जांच पूरी होने के बाद अन्य अभ्यर्थी भी दोषी पाए जाते हैं, तो उनकी नियुक्तियां भी रद्द हो सकती हैं।
उन्होंने बताया कि शुरुआती जांच में अदालत को यह प्रभाव दिया गया था कि पेपर लीक के व्यापक सबूत नहीं मिले हैं, लेकिन बाद में जब केस डायरी सामने आई तो उसमें कई अहम तथ्य और सबूत मौजूद थे। जांच में यह सामने आया कि करीब 120 विकल्प (ऑप्शंस) लीक हुए थे और आरोपी चंदन कुमार का एक कन्फेशनल स्टेटमेंट भी शुरुआती दौर में ही सामने आया था।
टेंटेड और नॉन-टेंटेड में फर्क करना मुश्किल हो तो पूरी परीक्षा रद्द करना ही कानून
अजीत कुमार ने समझाया कि जब किसी परीक्षा में बड़े पैमाने पर धांधली, पेपर लीक या भ्रष्टाचार के सबूत मिलते हैं, तो सबसे पहली जरूरत यह होती है कि दोषी (टेंटेड) और निर्दोष (नॉन-टेंटेड) अभ्यर्थियों के बीच फर्क किया जाए। अगर यह भेद करना संभव न हो, तो स्थापित कानून के अनुसार पूरी परीक्षा और उसका परिणाम रद्द कर दिया जाता है।
उनके मुताबिक चूंकि इन नियुक्तियों में शर्त (कंडीशन) पहले से जुड़ी थी, इसलिए राज्य सरकार के पास इस फैसले के लिए ठोस आधार और विस्तृत कारण जरूर होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि नियुक्तियां भले ही व्यक्तिगत रूप से (वन-टू-वन) दी जाती हैं, लेकिन रद्दीकरण हमेशा सामूहिक (मास कैंसिलेशन) रूप में ही होता है, क्योंकि दोषी और निर्दोष के बीच अंतर करना व्यावहारिक रूप से कठिन हो जाता है।
नौकरी छोड़कर आए अभ्यर्थियों के सवाल पर क्या बोले पूर्व महाधिवक्ता
कई अभ्यर्थी, जो पिछले 7 से 17 महीनों से नौकरी कर रहे थे और इसके लिए अपनी पुरानी नौकरियां छोड़ आए थे, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इस पर अजीत कुमार ने कहा कि उनकी सहानुभूति ऐसे अभ्यर्थियों के साथ जरूर है, लेकिन कानूनी रूप से उनकी नियुक्ति शुरू से ही “कंडीशनल” थी। उनके नियुक्ति पत्रों में संबंधित केस और उसकी जांच का जिक्र स्पष्ट रूप से किया गया था, और नियुक्ति माननीय न्यायालय के आदेश के बाद ही हुई थी।
उन्होंने कहा कि अगर जांच में यह साबित हो चुका है कि पेपर लीक हुआ था, तो एजेंसी के पास पूरी प्रक्रिया रद्द करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
“यहां नौकरियां बिकती हैं”: राज्य में भ्रष्टाचार को लेकर बनी आम धारणा पर चिंता
बातचीत के दौरान अजीत कुमार ने राज्य में भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर बनी आम धारणा पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से यह धारणा आम हो गई है कि राज्य में नौकरियां “बिकती” हैं, और यह चर्चा चौक-चौराहों से लेकर दफ्तरों तक हर जगह सुनाई देती है। उन्होंने जेपीएससी का उदाहरण देते हुए कहा कि करोड़ों रुपये की डील की बातें सामने आ रही हैं और आरोपी खुद इसे स्वीकार भी कर रहे हैं। उनके अनुसार, एक ब्लैकलिस्टेड एजेंसी को जेपीएससी अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किए जाने की बात भी सामने आई है।
उन्होंने इसे राज्य के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बताते हुए कहा कि भ्रष्टाचार के जरिए मिली नौकरियां आगे चलकर नए भ्रष्टाचारियों को जन्म देंगी, जो राज्य के विकास के लिए हानिकारक साबित होगा।
आंदोलनरत छात्रों की सीबीआई जांच की मांग, अब भी भूख हड़ताल जारी
रिपोर्ट के अनुसार, जो छात्र लंबे समय से आंदोलन में हैं, वे अब भी भूख हड़ताल पर डटे हुए हैं। उनकी मुख्य मांग है कि पूरे मामले की सीबीआई जांच कराई जाए। छात्रों का कहना है कि सरकार की ओर से अब तक कोई औपचारिक अधिसूचना जारी नहीं की गई है कि आखिर कौन-कौन सी परीक्षाएं रद्द की गई हैं। उन्हें आशंका है कि जेएसएससी पास कर चुके अभ्यर्थी अदालत का रुख करेंगे और वहां से दोबारा बहाली पा सकते हैं।
जल्दबाजी में सीबीआई की मांग न करें, कोर्ट का रास्ता सबके लिए खुला है
अजीत कुमार ने आंदोलनरत छात्रों को सलाह दी कि वे थोड़ा धैर्य रखें। उनका कहना है कि अगर सरकार के आदेश में कमजोर आधार या अधूरे कारण होंगे, तो न्यायिक समीक्षा (जुडिशियल रिव्यू) के दौरान अदालत इसमें हस्तक्षेप कर सकती है। वहीं जिन अभ्यर्थियों की नौकरी गई है, अगर वे यह साबित कर पाते हैं कि उनके और दोषी अभ्यर्थियों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकता है, तो भविष्य में उन्हें अदालत से राहत मिलने की संभावना भी बनी रह सकती है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और एक सामाजिक व्यक्ति व वरिष्ठ अधिवक्ता के तौर पर अपनी राय रख रहे हैं। उनके अनुसार, अगर जानबूझकर जांच में कुछ बिंदुओं को नजरअंदाज किया गया होगा, तो आगे भी सभी विकल्प छात्रों के लिए खुले रहेंगे।









प्रातिक्रिया दे