भेड़ों, बकरियों के बीच जीवन गुजार कर पुट्टाराज भीमनूर ने नीट जैसी परीक्षा को क्रैक किया। पिता दिव्यांग,मां कभी स्कूल नहीं गई फिर भी कमाल का रैंक।

puttaraj bhimanur neet success story

यह सफलता की कहानी उन छात्रों के लिए एक प्रेरणा है जिनके पास साधनों की कमी होती है तथा वे इसी चीज को सोचने में कुछ कर नहीं पाते। यह कहानी कर्नाटक की एक लड़के की है जिसने बिना किसी साधन के ही नीट परीक्षा में शानदार अंक प्राप्त करते हुए ये बता दिया कि अगर इरादे मजबूत हो तो आपके सफलता के बीच आने वाली परिस्थिति भी आपके आगे नतमस्तक हो जाती है।

कर्नाटक राज्य के कोपल जिले का एक नीट का छात्र पुट्टाराज भीमनूर जो कि अपनी कड़ी मेहनत के बदौलत नीट परीक्षा में 511 अंक पाकर बिना किसी साधन के गरीबी में पढ़कर अपने मां–बाप का नाम रोशन करते हुए एस टी वर्ग ऑल इंडिया रैंक 694 प्राप्त कर अपने डॉक्टर बनने के सपने को एक नया उड़ान दिया।

पिता शारीरिक रूप से दिव्यांग, मां कभी स्कूल में नहीं पढ़ पाई।

पुट्टाराज भीमनूर के पिता शारीरिक रूप से दिव्यांग है। वह पेशे से एक टेक्नीशियन है और वो बोरवेल का काम करते है। उनकी पढ़ाई मात्र आठवीं कक्षा तक हुई। जबकि पुट्टाराज भीमनूर की मां ने कभी स्कूल का मुंह तक नहीं देखा। फिर भी मां–बाप ये कहकर छात्र का हौसला बढ़ाते थे कि, हमने तो अपनी पढ़ाई अच्छे से पढ़ी नहीं, हम चाहते है कि हमारा सपना तुम पढ़कर पूरा करो। बस यही शब्दों ने पुट्टाराज भीमनूर को अपने मंजिल तक पहुंचने में मदद की।

60×25 फिट के छोटे से घर में गुजारा करते है पुट्टाराज भीमनूर के 20 परिवार अपना जीवन।

पुट्टाराज भीमनूर के परिवार एक बड़ा परिवार है लेकिन गरीबी के मारे ने उन्हें एक 60×25 फिट के घर में कुल 20 परिवारों के साथ रहने में मजबूर कर दिया। इतने कम संसाधनों के बावजूद भी पुट्टाराज ने वो कर दिखाया जो दूसरे गरीब छात्रों के लिए एक प्रेरणा बन गई। आर्थिक तंगी के कारण पुट्टाराज भीमनूर ने अपनी पूरी पढ़ाई एक सोलर लैंप के सहारे रात में किया। उसके गांव में मात्र सात घंटे दिन में ही बिजली आती थी, और न ही उसकी इतनी आर्थिक स्थिति मजबूत थी। इसी के कारण वह दिन में भेड़–बकरिया चराता था और खेतों में काम किया करता था। रात में वह आकर अपनी पढ़ाई पूरे लगन के साथ करता था।

बड़े भाई ने आर्थिक तंगी के कारण बीच में पढ़ाई छोड़ी।

पुट्टाराज भीमनूर कुल तीन भाई–बहन है। इन तीनों भाई–बहन में से सबसे बड़ा एक भाई है, दूसरे नंबर पर पुट्टाराज और तीसरे नंबर पर एक छोटी बहन है जो कि फिलहाल दसवीं कक्षा में पढ़ती है। घर का पेट पालने के लिए पुट्टाराज के बड़े भाई ने बीच में ही पढ़ाई को पूरी तरीके से छोड़ दिया और घर की स्थिति ठीक न होने के कारण वह काम करने लगा। लेकिन पुट्टाराज भीमनूर ने हार नहीं मानी वह पढ़ता रह गया और इस मुकाम को हासिल किया।

उसके दादा–दादी कहते है कि वह बचपन के उम्र से ही लगभग 6 वर्षों से ही भेड़–बकरियां को चराता और उनके साथ डॉक्टर की भांति उनका चेकअप करता। इस बचपन की खेल–खेल में डॉक्टर बनने की रुचि ने पुट्टाराज भीमनूर को आज इस मुकाम पर खड़ा कर दिया। जहां से वो अब बड़े सपने देख सकता है और अपने मंजिल को पा सकता है।

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