Delimitation Bill 2026: लोकसभा सीटें 850 तक बढ़ाने की तैयारी, महिलाओं को 33% आरक्षण का रास्ता साफ

नई संसद भवन की तस्वीर, Delimitation Bill 2026 के तहत लोकसभा सीटें बढ़ाने और महिला आरक्षण पर संसद की बहस को दर्शाती हुई

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने संसद के विशेष सत्र में ‘The Delimitation Bill 2026’ पेश करके लोकसभा व विधानसभा सीटों के बड़े पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जिसके ज़रिए लोकसभा की ताकत को अधिकतम 850 सीटों तक बढ़ाने और महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लागू करने का रास्ता साफ किया जाएगा। प्रस्तावित कानून के तहत नई डिलिमिटेशन कमिशन 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर देशभर की संसदीय और विधानसभा सीटों की नए सिरे से सीमारेखा तय करेगी।

क्या है Delimitation Bill 2026?

केंद्र सरकार ‘The Delimitation Bill, 2026’ के ज़रिए मौजूदा Delimitation Act, 2002 को खत्म कर एक नया ढांचा लागू करना चाहती है, जिसके तहत लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों का पुनर्विन्यास “नवीनतम जनगणना आंकड़ों” पर आधारित होगा। यह बिल संविधान के 131वें संशोधन विधेयक के साथ लाया जा रहा है, जो संसद को यह अधिकार देता है कि वह 2026 के बाद होने वाली अगली जनगणना का इंतज़ार किए बिना 2011 की जनगणना के आधार पर भी डिलिमिटेशन कर सके।

सरकार का कहना है कि 1971 की जनगणना के आधार पर तय मौजूदा सीट बंटवारे ने तेजी से बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य को प्रतिबिंबित नहीं किया, जिसके कारण कई निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में अत्यधिक असमानता पैदा हो गई है।

लोकसभा में सीटें 543 से 850 तक

संविधान (131वां संशोधन) विधेयक के अनुसार लोकसभा की अधिकतम सीमा 550 से बढ़ाकर 850 तक करने का प्रस्ताव रखा गया है, जिससे वर्तमान 543 चुनी हुई सीटों में लगभग 50–55% तक वृद्धि की संभावना बनती है। उपलब्ध मसौदों और सरकारी ब्रीफिंग के अनुसार, अनुमान है कि इनमें से लगभग 815 सीटें राज्यों को और 35 सीटें केंद्रशासित प्रदेशों को मिल सकती हैं, जबकि अंतिम संख्या Delimitation Commission तय करेगी और 850 को केवल ऊपरी सीमा के रूप में देखा जाएगा।

सरकार का तर्क है कि सीटों की बढ़ोतरी से प्रत्येक संसदीय क्षेत्र की औसत आबादी घटेगी और सांसदों के लिए अपने मतदाताओं तक प्रभावी पहुंच आसान होगी, जिससे जनप्रतिनिधि और मतदाताओं के बीच जवाबदेही मजबूत हो सकती है।

2011 जनगणना को आधार बनाने की तैयारी

संविधान का अनुच्छेद 82 यह व्यवस्था करता है कि डिलिमिटेशन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर होना चाहिए, लेकिन 131वें संशोधन के ज़रिए सरकार इस शर्त को बदलकर 2011 की जनगणना को भी आधार बनाने का विकल्प चाहती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 2011 के आंकड़ों पर आधारित डिलिमिटेशन से 2029 के आम चुनावों से पहले ही नई सीमाओं और बढ़ी हुई सीटों के साथ चुनाव कराना संभव हो जाएगा।

सरकारी सूत्रों के अनुसार, 850 सीटों की संख्या किसी तय कोटे के रूप में नहीं बल्कि अधिकतम सीमा के रूप में प्रस्तावित है और वास्तविक आंकड़ा Delimitation Commission की सिफारिशों पर निर्भर करेगा।

नई Delimitation Commission की रूपरेखा

Delimitation Bill 2026 के मसौदे के अनुसार, एक तीन-सदस्यीय Delimitation Commission गठित की जाएगी, जिसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के किसी वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश द्वारा की जाएगी। इसके दो अन्य सदस्य मुख्य चुनाव आयुक्त या उनके द्वारा नामित कोई चुनाव आयुक्त तथा संबंधित राज्य के राज्य चुनाव आयुक्त होंगे, जो आयोग के पदेन सदस्य होंगे।

आयोग लोकसभा और विधानसभाओं की कुल सीटों, प्रत्येक राज्य/केंद्रशासित प्रदेश के लिए सीट आवंटन, प्रत्येक क्षेत्र की सीमा-रेखा और महिलाओं, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करेगा। आयोग की अंतिम सिफारिशें राजपत्र में प्रकाशित होते ही बाध्यकारी मानी जाएंगी और उसके बाद होने वाले सभी आम एवं उपचुनाव इन्हीं नई सीमाओं के तहत होंगे।

महिलाओं के लिए 33% आरक्षण से सीधा संबंध

यह डिलिमिटेशन प्रक्रिया 2023 में पारित महिला आरक्षण कानून से सीधे तौर पर जुड़ी है, जिसमें स्पष्ट प्रावधान है कि लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण अगली डिलिमिटेशन के बाद ही लागू होगा। मौजूदा प्रस्तावों के अनुसार, बढ़ी हुई लोकसभा में लगभग एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी और यदि कुल सीटें 816 के आसपास रहती हैं तो करीब 273 सीटें महिलाओं के हिस्से आ सकती हैं।

महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण लॉटरी की प्रक्रिया से किया जाएगा और इन्हें प्रारंभिक रूप से 15 वर्ष की अवधि के लिए आरक्षित माना जाएगा, जिसके बाद समीक्षा का प्रावधान रखा गया है। फिलहाल लोकसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 14% और अधिकांश विधानसभाओं में 10% से भी कम है, ऐसे में यह आरक्षण भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को ऐतिहासिक रूप से बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।

उत्तर–दक्षिण संतुलन पर उठते सवाल

डिलिमिटेशन बहस का सबसे बड़ा राजनीतिक और भावनात्मक पहलू उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सीट बंटवारे के संभावित असर को लेकर है। दक्षिण भारत के राज्यों में लंबे समय से आशंका है कि यदि प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या के आधार पर तय हुआ तो परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को दंडित करते हुए उनकी सीटें घट सकती हैं।

हाल के नीति-पत्रों और विश्लेषणों में संकेत है कि सरकार सीटों में कुल मिलाकर 50% वृद्धि तो 2011 की जनगणना के आधार पर करेगी, लेकिन राज्यों का आपसी प्रतिशत अनुपात लगभग वही रखा जाएगा, जिससे किसी राज्य की “हिस्सेदारी” घटे नहीं बल्कि संख्या के लिहाज़ से सबकी सीटें बढ़ें। उदाहरण के तौर पर, एक विश्लेषण में बताया गया है कि उत्तर प्रदेश की लोकसभा सीटें 80 से बढ़कर लगभग 120 और तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 तक जा सकती हैं, जिससे दोनों की सापेक्ष हिस्सेदारी लगभग पहले जैसी ही बनी रहती है।

इसके बावजूद तमिलनाडु, केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों के कई नेताओं ने इसे संघीय संतुलन के लिए ख़तरा बताते हुए कड़ा विरोध जताया है और आशंका व्यक्त की है कि आने वाले चरणों में जनसंख्या को ही मुख्य पैमाना बनाए जाने पर दक्षिण की ताकत कमजोर हो सकती है।

सियासी हलकों में तकरार तेज

Delimitation Bill 2026 के सामने आते ही संसद और राज्यों की राजनीति में इस पर तीखी तकरार शुरू हो गई है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “संघीय ढांचे पर हमला” बताते हुए कहा कि केंद्र ने राज्यों से समुचित सलाह-मशविरा किए बिना एकतरफा कदम उठाया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रीवन्त रेड्डी ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर दक्षिणी राज्यों की संयुक्त रणनीति की वकालत की है।

मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने महिला आरक्षण का खुले तौर पर समर्थन करते हुए भी Delimitation Bill के तौर-तरीकों पर आपत्ति जताई है और आरोप लगाया है कि इसे जाति जनगणना टालने और कुछ क्षेत्रों में राजनीतिक लाभ पहुंचाने के औज़ार के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।

दूसरी तरफ केंद्र और भाजपा नेतृत्व का कहना है कि किसी भी राज्य की वर्तमान सीटें कम नहीं होंगी और सीटों में वृद्धि सभी राज्यों के लिए अनुपातिक रूप से होगी, जिससे दक्षिणी राज्यों की सीटें भी संख्या के लिहाज़ से बढ़ेंगी। भाजपा नेताओं का दावा है कि नए मॉडल में न सिर्फ महिलाओं और हाशिये पर खड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों के बीच प्रतिनिधित्व का दीर्घकालिक संतुलन भी साधा जा सकेगा।

लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व पर असर

विश्लेषकों का मानना है कि यदि लोकसभा सीटों में प्रस्तावित बढ़ोतरी लागू होती है तो बड़े और घनी आबादी वाले निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं का बोझ कम होगा और सांसदों के लिए क्षेत्रीय मुद्दों पर गंभीरता से फोकस करना अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा। इससे ग्रामीण–शहरी संतुलन को भी बेहतर ढंग से साधने और तेजी से बढ़ते शहरी इलाकों की मांगों को बेहतर प्रतिनिधित्व देने का अवसर मिलेगा।

महिला आरक्षण और अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए आरक्षित सीटों के पुनर्निर्धारण के साथ संसद और विधानसभाओं में सामाजिक विविधता का प्रतिबिंब और मजबूत हो सकता है, जिससे नीतिगत विमर्श में हाशिये के समुदायों की आवाज़ और तेज़ होगी। हालांकि, यह भी ज़रूरी होगा कि आरक्षण और डिलिमिटेशन दोनों प्रक्रियाओं को पारदर्शी, सर्वसम्मति और व्यापक परामर्श के साथ लागू किया जाए, ताकि किसी क्षेत्र या वर्ग में स्थायी असंतोष जन्म न ले।

आगे की प्रक्रिया और चुनौतियाँ

Delimitation Bill 2026 और संविधान (131वां संशोधन) फिलहाल संसद में विचार-विमर्श और संभावित संशोधनों की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। विधेयकों के पारित होते ही नई Delimitation Commission के गठन, उसके कार्यकाल, राज्यों से परामर्श, प्रारूप रिपोर्ट और अंतिम आदेशों की समय-सीमा तय होगी, जिसकी दिशा आने वाले दशकों के लिए भारत के राजनीतिक नक्शे को परिभाषित करेगी।

चुनौती यही है कि सरकार किस तरह राज्यों, विपक्षी दलों, क्षेत्रीय पार्टियों और नागरिक समाज की चिंताओं को साथ लेकर एक सहमति-आधारित मॉडल तैयार करती है। यदि यह कवायद संवाद, पारदर्शिता और भरोसे के साथ आगे बढ़ती है, तो Delimitation Bill 2026 भारतीय लोकतंत्र को अधिक समावेशी और प्रतिनिधि बनाने की दिशा में बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है; अन्यथा यह उत्तर–दक्षिण, शहरी–ग्रामीण और केंद्र–राज्य तनावों को और तेज कर सकता है।

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