ईरान ने ट्रंप का शांति प्रस्ताव ठुकराया, मांगा युद्ध से हुए नुकसान का मुआवजा

राष्टपति डोनाल्ड ट्रम्प बाएं और ईरान लीडरशिप दाएं - ट्रम्प के शांति प्रस्ताव को ठुकराते हुए युद्ध के नुकसान का मुवावजा माँगा

अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को खत्म करने की कोशिशों को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब ईरान ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ताज़ा शांति प्रस्ताव को सिरे से नकार दिया। ईरान ने पाकिस्तान के ज़रिए भेजे गए अपने जवाबी प्रस्ताव में होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर अपनी संप्रभुता की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता और युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई की मांग की है।

ट्रंप ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए Truth Social पर लिखा —

“मैंने ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ लिया। मुझे यह बिल्कुल पसंद नहीं – यह पूरी तरह अस्वीकार्य है!”

ईरान की शर्तें क्या हैं?

ईरानी राज्य मीडिया के अनुसार इस जवाबी प्रस्ताव में जमे हुए ईरानी संपत्तियों की वापसी और प्रतिबंधों को हटाने की मांग भी शामिल है। साथ ही ईरान ने लेबनान सहित पूरे क्षेत्र में युद्ध विराम की मांग की है।

एक ईरानी राजनयिक सूत्र ने को बताया कि तेहरान का जवाब “यथार्थवादी और सकारात्मक” था और अब गेंद वाशिंगटन के पाले में है।

अमेरिका ने क्या माँगा था?

अमेरिका के 14-सूत्रीय प्रस्ताव में ईरान से कम से कम 12 साल के लिए यूरेनियम संवर्धन रोकने और अपने 440 किलोग्राम 60% संवर्धित यूरेनियम को सौंपने की शर्त रखी गई थी। अमेरिकी राजदूत माइक वॉल्ट्ज ने Fox News पर कहा कि ट्रंप एक बात पर बिल्कुल स्पष्ट हैं — ईरान कभी परमाणु हथियार नहीं बना सकता और वह दुनिया की अर्थव्यवस्था को बंधक नहीं बना सकता।

पाकिस्तान की भूमिका और उम्मीद

पाकिस्तान इस वार्ता में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। एक पाकिस्तानी विश्लेषक ने कहा कि अगले कुछ दिन निर्णायक होंगे क्योंकि होर्मुज़ की लंबी नाकेबंदी पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को भी बुरी तरह प्रभावित कर रही है — ईंधन की कीमतें आसमान पर हैं।

होर्मुज़ – असली दांव

होर्मुज़ जलडमरूमध्य, जिससे शांतिकाल में दुनिया के करीब 20% तेल और LNG की आपूर्ति होती है, इस युद्ध में सबसे बड़ा दांव बन चुका है। बीते हफ्ते हुई झड़पों के बावजूद ट्रंप ने दावा किया कि युद्धविराम बरकरार है।

आगे क्या? विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्षों के बीच की खाई अभी बहुत गहरी है। ईरानी सांसद इब्राहिम रज़ाई ने अमेरिकी प्रस्ताव को “अमेरिका की इच्छा-सूची” से ज़्यादा कुछ नहीं बताया। दुनिया की नज़रें अब इस्लामाबाद और वाशिंगटन के अगले कदम पर टिकी हैं।

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