अपरा एकादशी 2026: इस वर्ष अपरा एकादशी (Apara Ekadashi) का पावन व्रत 13 मई 2026, बुधवार को मनाया जाएगा। यह एकादशी ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष में पड़ती है और इसे अचला एकादशी भी कहा जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों और गंगा स्नान के समान पुण्य मिलता है।
अपरा एकादशी — एक नज़र में
| व्रत का नाम | अपरा एकादशी (अचला एकादशी) |
| तिथि | 13 मई 2026, बुधवार |
| मास | ज्येष्ठ मास, कृष्ण पक्ष |
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 12 मई 2026, रात 11:11 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 13 मई 2026, रात 11:46 बजे |
| पारण (व्रत तोड़ने का समय) | 14 मई 2026, सुबह 05:35 – 08:18 बजे |
| देवता | भगवान श्री विष्णु (त्रिविक्रम रूप) |
| विशेष फल | पापों से मुक्ति, मोक्ष प्राप्ति, पितृ दोष निवारण |
अपरा एकादशी क्या है? – परिचय एवं पौराणिक महत्व
हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र माना जाता है। वर्ष में कुल 24 एकादशियाँ आती हैं और हर एकादशी का अपना विशेष महत्व होता है। ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अपरा एकादशी या अचला एकादशी कहते हैं। “अपरा” शब्द का अर्थ है — जिसकी कोई सीमा न हो, अर्थात् जो अपार पुण्य देने वाली हो।
पद्म पुराण में भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को बताया था कि अपरा एकादशी का व्रत करने वाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त हो जाता है। यहाँ तक कि ब्रह्महत्या, भ्रूण हत्या, गुरु की निंदा जैसे महापापों का भी नाश इस व्रत से हो जाता है।
“अपरा नाम दशम्यां तु एकादशी फलप्रदा। अश्वमेधसहस्रस्य फलं दत्ते न संशयः।।”
— पद्म पुराण
अर्थात् — अपरा एकादशी का व्रत हजारों अश्वमेध यज्ञों के फल के बराबर पुण्य प्रदान करता है, इसमें कोई संदेह नहीं।
अपरा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त एवं पूजा का समय
पंचांग के अनुसार इस वर्ष एकादशी तिथि 12 मई की रात से प्रारंभ होकर 13 मई की रात तक रहेगी। चूँकि उदय तिथि 13 मई को है, इसलिए व्रत 13 मई, बुधवार को ही रखा जाएगा।
शुभ मुहूर्त विवरण
| ब्रह्म मुहूर्त | 04:05 – 04:50 बजे (13 मई) |
| अभिजित् मुहूर्त | 11:52 – 12:47 बजे |
| विष्णु पूजा का सर्वोत्तम समय | सुबह 07:00 – 10:30 बजे |
| रात्रि जागरण का समय | 12 मई, रात 10:00 बजे से 13 मई, प्रातः 04:00 बजे तक |
| पारण (व्रत खोलने का समय) | 14 मई, सुबह 05:35 – 08:18 बजे |
अपरा एकादशी व्रत की सम्पूर्ण पूजा विधि
अपरा एकादशी का व्रत विधि-विधान से करने पर विशेष फल मिलता है। नीचे सम्पूर्ण पूजा विधि दी गई है —
दशमी (12 मई) की रात से करें ये तैयारी
एकादशी व्रत की तैयारी दशमी तिथि की रात से ही शुरू हो जाती है। व्रती को दशमी की रात सात्विक भोजन करना चाहिए। माँस, मदिरा, प्याज, लहसुन और मसूर दाल का सेवन नहीं करना चाहिए। रात को जल्दी सोएं और प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठें।
एकादशी (13 मई) की सुबह की विधि
प्रातः स्नान: सूर्योदय से पहले उठकर किसी पवित्र नदी, कुंड या घर में ही गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय मन में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।
संकल्प: स्नान के बाद हाथ में जल, फूल और अक्षत लेकर भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प करें कि “मैं आज निर्जला/फलाहारी एकादशी व्रत करूँगा/करूँगी।”
पूजा स्थापना: पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाएं और भगवान विष्णु या त्रिविक्रम रूप की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- तुलसी दल – विष्णु को प्रिय
- पीले फूल – अर्पित करें
- पंचामृत – अभिषेक करें
- दीपक – घी का दीपक
- मंत्र जाप – 108 बार
- फलाहार – व्रत का भोजन
षोडशोपचार पूजा: भगवान विष्णु को आवाहन, आसन, पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, यज्ञोपवीत, गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, आरती और प्रदक्षिणा अर्पित करें। विशेष रूप से तुलसी के पत्ते, पीले फूल और पीले फल भगवान विष्णु को अर्पित करें।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ: पूजा के बाद विष्णु सहस्रनाम या भगवद् गीता के किसी अध्याय का पाठ करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें।
दान-पुण्य का महत्व
अपरा एकादशी पर दान का विशेष महत्व है। इस दिन ब्राह्मणों को भोजन करवाएं, गरीबों को अन्न-वस्त्र दान करें, गौ सेवा करें और मंदिरों में दान दें। यह व्रत पितृ दोष निवारण के लिए भी विशेष फलदायी माना जाता है, इसलिए पितरों के निमित्त तर्पण और श्राद्ध करना भी शुभ होता है।
अपरा एकादशी की पौराणिक कथा
पद्म पुराण में वर्णित कथा के अनुसार – प्राचीन काल में महीध्वज नामक एक धर्मात्मा राजा था। उसका छोटा भाई वज्रध्वज अत्यंत पापी और क्रूर स्वभाव का था। वज्रध्वज ने ईर्ष्यावश अपने बड़े भाई की हत्या कर दी और उसके शव को एक पीपल के वृक्ष के नीचे दबा दिया।
मृत्यु के बाद महीध्वज की आत्मा प्रेत योनि को प्राप्त हुई और वह उसी पीपल के वृक्ष पर निवास करने लगी। एक दिन महर्षि धौम्य उस रास्ते से गुजरे। उन्होंने प्रेत आत्मा को देखा और अपने योग बल से उसकी पूर्ण कथा जान ली।
महर्षि धौम्य ने अत्यंत दयालु होकर उस प्रेत आत्मा को मुक्ति दिलाने के लिए स्वयं अपरा एकादशी का व्रत किया और उसका सम्पूर्ण पुण्य महीध्वज की आत्मा को समर्पित कर दिया। इस व्रत के प्रभाव से महीध्वज की आत्मा प्रेत योनि से मुक्त होकर दिव्य विमान में बैठकर विष्णु लोक को प्रस्थान कर गई।
इस कथा से स्पष्ट होता है कि अपरा एकादशी का व्रत न केवल स्वयं के पापों का नाश करता है, बल्कि पितरों और पूर्वजों की आत्मा को भी मोक्ष प्रदान करता है।
अपरा एकादशी पर क्या करें और क्या न करें
करें (Do’s)
- प्रातः जल्दी उठकर स्नान और पूजा करें
- भगवान विष्णु का ध्यान और मंत्र जाप करें
- दिन भर फलाहार करें या निर्जला व्रत रखें
- रात को जागरण करें और भजन-कीर्तन करें
- ब्राह्मण और गरीबों को भोजन व दान दें
- तुलसी की पूजा और परिक्रमा करें
- पितरों के लिए तर्पण और श्राद्ध करें
न करें (Don’ts)
- चावल, अनाज और नमक का सेवन न करें
- माँस, मदिरा, प्याज, लहसुन न खाएं
- किसी की निंदा, झूठ या छल न करें
- पीपल के पेड़ को न छुएं और न काटें
- दिन में नींद न लें
- व्रत के दिन बाल न काटें, न दाढ़ी बनाएं
- कोई भी तामसिक काम न करें
अपरा एकादशी के विशेष मंत्र
इस दिन निम्नलिखित मंत्रों का जाप विशेष फलदायी होता है —
विष्णु का मूल मंत्र:
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
एकादशी व्रत संकल्प मंत्र:
“ॐ विष्णवे नमः, ममोपात्त-दुरित-क्षयार्थं अपरा एकादशी व्रतं करिष्ये।”
त्रिविक्रम मंत्र:
“ॐ त्रिविक्रमाय नमः”
अपरा एकादशी का फल — किसे मिलता है सबसे ज्यादा लाभ?
अपरा एकादशी का व्रत विशेष रूप से उन लोगों के लिए फलदायी है जो —
पितृ दोष या कालसर्प दोष से पीड़ित हैं, जिनके घर में अकाल मृत्यु हुई हो, जो किसी अनजाने पाप के प्रभाव से मुक्ति चाहते हों, जो संतान प्राप्ति या विवाह में बाधाओं से परेशान हों, या जो अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए कुछ करना चाहते हों।
शास्त्रों के अनुसार इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय स्नान से मिलने वाले पुण्य के बराबर फल मिलता है। यही नहीं, काशी में मृत्यु, गया में श्राद्ध और पुष्कर में स्नान जितना पुण्य भी इस एकादशी के व्रत से प्राप्त होता है।
देश के प्रमुख विष्णु मंदिरों में होती है विशेष पूजा
अपरा एकादशी के अवसर पर देश के प्रमुख वैष्णव तीर्थों — वृंदावन, मथुरा, द्वारका, तिरुपति बालाजी, बद्रीनाथ और पुरी जगन्नाथ में विशेष पूजा, भजन-कीर्तन और भंडारे का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु इस दिन इन तीर्थों पर जाकर भगवान विष्णु के दर्शन करते हैं।
वृंदावन और मथुरा में इस एकादशी पर विशेष रास-लीला और भागवत कथा का आयोजन होता है। तिरुपति बालाजी मंदिर में लाखों भक्त भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन के लिए आते हैं।
पारण विधि – व्रत कैसे खोलें?
एकादशी व्रत का पारण (व्रत तोड़ना) 14 मई 2026, गुरुवार को सुबह 05:35 बजे से 08:18 बजे के बीच करना चाहिए। पारण में द्वादशी तिथि का ध्यान रखें।
पारण में पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, तुलसी की पत्तियाँ जल में डालकर उसे पिएं, फिर ब्राह्मण को भोजन कराएं और तत्पश्चात् स्वयं भोजन ग्रहण करें। हरिवासर में (द्वादशी के पहले चरण में) पारण नहीं करना चाहिए।











प्रातिक्रिया दे