1919 के बाद पहली बार नवीकरणीय ऊर्जा ने कोयले को पीछे छोड़ा, सौर और पवन ने बनाया वैश्विक रिकॉर्ड

2025 में वैश्विक बिजली उत्पादन में कोयले से आगे बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा, सौर और पवन परियोजनाओं का ग्राफिक

1919 के बाद पहली बार दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों ने कोयले से अधिक बिजली पैदा की है, जिसे ऊर्जा क्षेत्र में ऐतिहासिक मोड़ माना जा रहा है। नवीनतम विश्लेषण के अनुसार 2025 में वैश्विक बिजली उत्पादन में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी लगभग 33% तक पहुंच गई, जो कोयले के हिस्से से थोड़ा अधिक है।

सौर और पवन ऊर्जा ने बदल दी तस्वीर

रिपोर्टों के मुताबिक सौर ऊर्जा ने अकेले ही वैश्विक बिजली की बढ़ती मांग का लगभग तीन‑चौथाई हिस्सा पूरा किया, जबकि सौर और पवन ऊर्जा मिलकर नई मांग का लगभग 99% तक बोझ उठा रही हैं। पिछले तीन वर्षों में दुनिया भर में सौर ऊर्जा उत्पादन लगभग दोगुना हो गया है और लगातार 21वें वर्ष यह बिजली का सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला स्रोत बना हुआ है।

सौर ऊर्जा का वार्षिक उत्पादन अब लगभग 2,700–2,800 टेरावॉट‑घंटे के आसपास पहुंच गया है, जो लगभग पूरे यूरोपीय संघ की सालभर की बिजली खपत के बराबर माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि 2025 में सौर ऊर्जा ने पहली बार पवन ऊर्जा को भी पीछे छोड़ दिया है और निकट भविष्य में इसके परमाणु ऊर्जा से भी आगे निकलने की संभावना जताई जा रही है।

कोयला युग पर ब्रेक, लेकिन पूरी तरह अंत नहीं

हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बढ़ने से कोयले की हिस्सेदारी घट गई है, फिर भी दुनिया अब भी बड़ी मात्रा में कोयला जला रही है। अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के अनुमान के अनुसार वैश्विक स्तर पर कोयला खपत अरबों टन के स्तर पर बनी हुई है, जो जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण के लिए बड़ी चुनौती मानी जाती है।

विश्लेषकों का कहना है कि कोयले की हिस्सेदारी में गिरावट ऐतिहासिक है, लेकिन तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित रखने के लिए यह रफ्तार अभी भी पर्याप्त नहीं है। कई विकसित देशों में नवीकरणीय ऊर्जा में वृद्धि के बावजूद गैस और अन्य जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल अभी भी ऊंचा बना हुआ है।

चीन – भारत जैसे उभरते देशों की बड़ी भूमिका

रिपोर्टों के अनुसार नवीकरणीय ऊर्जा की तेज़ बढ़त में चीन और भारत जैसे विकासशील देशों की भूमिका अहम रही है, जहां बड़े पैमाने पर सौर और पवन परियोजनाएं चालू हुई हैं। चीन में रिकॉर्ड स्तर पर सौर पार्क और पवन फार्म लगाए गए, जबकि भारत में भी बिजली की बढ़ती मांग का बड़ा हिस्सा अब नई नवीकरणीय क्षमता से पूरा किया जाने लगा है।

इसके विपरीत कई विकसित अर्थव्यवस्थाओं में, खासकर कुछ पश्चिमी देशों में, हाल के वर्षों में स्वच्छ ऊर्जा नीतियों की रफ्तार धीमी पड़ने से नवीकरणीय परियोजनाओं के विस्तार की गति पर सवाल उठ रहे हैं। ऊर्जा विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि अगर नीति‑निर्माण और निवेश में स्पष्ट दिशा नहीं दी गई तो नवीकरणीय ऊर्जा की वैश्विक लय पर भी असर पड़ सकता है।

2030 तक क्षमता दोगुनी से भी अधिक होने की उम्मीद

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के ताज़ा अनुमान के अनुसार 2030 तक दुनिया भर में नवीकरणीय ऊर्जा की स्थापित क्षमता 4,600 गीगावॉट तक पहुंच सकती है, जो आज की क्षमता से कहीं अधिक है। अनुमान यह भी है कि इस नई स्वच्छ क्षमता का लगभग 80% हिस्सा अकेले सौर ऊर्जा से आएगा, यानी आने वाले दशक में भी सौर ऊर्जा ही इस बदलाव की मुख्य धुरी बनी रहेगी।

हालांकि यह वृद्धि अभूतपूर्व कही जा रही है, फिर भी यह उस “तीन गुना” लक्ष्य से कम है, जिस पर कई देशों ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु मंचों पर सहमति जताई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि लक्ष्य को हासिल करने के लिए कोयला और गैस से तेज़ी से बाहर निकलते हुए नवीकरणीय और ग्रिड‑अपग्रेड में निवेश को और बढ़ाना होगा।

जलवायु लक्ष्य, रोजगार और निवेश पर असर

नवीकरणीय ऊर्जा के कोयले से आगे निकलने से वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को नया सहारा मिला है, क्योंकि बिजली क्षेत्र से उत्सर्जन कम करना कुल ग्रीनहाउस गैसों में कटौती की दिशा में सबसे अहम कदम माना जाता है। सौर और पवन परियोजनाएं न सिर्फ कार्बन उत्सर्जन घटाती हैं, बल्कि करोड़ों लोगों के लिए नए रोजगार और निवेश के अवसर भी पैदा कर रही हैं।

ऊर्जा विशेषज्ञों की राय में अगर मौजूदा रफ्तार बरकरार रही और नीतिगत समर्थन मजबूत हुआ, तो अगले दशक में वैश्विक बिजली प्रणाली में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी 50% के स्तर के करीब पहुंच सकती है। हालांकि इसके लिए ट्रांसमिशन नेटवर्क, बैटरी स्टोरेज, ग्रीन हाइड्रोजन और फ्लेक्सिबल ग्रिड जैसी तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत पर भी जोर दिया जा रहा है।

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