पाकिस्तान US के लिए सबसे बड़े परमाणु खतरों में से एक – तुलसी गबार्ड

Pakistan and US nuclear tension with intelligence official briefing

वाशिंगटन : अमेरिका की खुफिया एजेंसी की प्रमुख और Director of National Intelligence (DNI) तुलसी गबार्ड ने चेतावनी दी है कि पाकिस्तान संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए सबसे बड़े परमाणु खतरों में से एक बन कर उभरा है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान समेत रूस, चीन, उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देश ऐसी नई मिसाइल डिलीवरी प्रणालियां और परमाणु क्षमताएं विकसित कर रहे हैं, जो सीधे अमेरिकी होमलैंड तक मार कर सकती हैं और आने वाले वर्षों में इनकी संख्या कई गुना बढ़ने का अनुमान है।​

तुलसी गबार्ड कौन हैं और उनकी भूमिका क्या है?

तुलसी गबार्ड पूर्व अमेरिकी कांग्रेस सदस्य रही हैं और फिलहाल राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन में Director of National Intelligence के तौर पर पूरे अमेरिकी इंटेलिजेंस समुदाय (IC) का नेतृत्व कर रही हैं। हाल के महीनों में उन्होंने ईरान के परमाणु कार्यक्रम, परमाणु युद्ध के बढ़ते जोखिम और वैश्विक सुरक्षा माहौल पर कई कड़े बयान दिए हैं, जिन पर अमेरिकी राजनीति और मीडिया में तीखी बहस भी हुई है।

बयान कब और किस संदर्भ में दिया गया?

तुलसी गबार्ड का यह ताज़ा बयान अमेरिकी कांग्रेस की एक ब्रीफिंग/हियरिंग के दौरान आया, जहां वे 2025–26 के लिए अमेरिकी इंटेलिजेंस समुदाय की वार्षिक ‘थ्रेट असेसमेंट’ पर सांसदों को जानकारी दे रही थीं। इसी दौरान उन्होंने चेतावनी दी कि रूस, चीन, उत्तर कोरिया, ईरान और पाकिस्तान, सभी नई या उन्नत मिसाइल डिलीवरी सिस्टम विकसित कर रहे हैं, जिन पर परमाणु या पारंपरिक दोनों तरह के वारहेड लगाए जा सकते हैं और जो सीधे अमेरिकी ज़मीन तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं।​​

‘सबसे बड़े परमाणु खतरों में से एक’ वाली पंक्ति का वास्तविक मतलब

गबार्ड ने अपने बयान में यह आकलन रखा कि इंटेलिजेंस समुदाय के अनुसार ये देश मिलकर ऐसी मिसाइल ताकत खड़ी कर रहे हैं, जिससे 2035 तक अमेरिकी होमलैंड को निशाना बना सकने वाली कुल मिसाइलों की संख्या वर्तमान 3,000 से बढ़कर 16,000 से अधिक हो सकती है। उन्होंने खास तौर पर पाकिस्तान के लंबे दूरी के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम का ज़िक्र किया और कहा कि इसका विकास आगे चलकर ऐसी इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइलों (ICBM) तक जा सकता है, जिनकी रेंज अमेरिका तक होगी — यही बात पाकिस्तान को “सबसे बड़े परमाणु खतरों में से एक” की श्रेणी में रखती है।​​

पाकिस्तान के बारे में अमेरिकी रिपोर्टें क्या कहती हैं?

अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) की 2025 की ‘वर्ल्डवाइड थ्रेट असेसमेंट’ रिपोर्ट में साफ कहा गया कि पाकिस्तान खुद भारत को “अस्तित्वगत खतरा” मानता है और इसी वजह से वह अपने सैन्य आधुनिकीकरण के साथ‑साथ बैटलफील्ड न्यूक्लियर वेपन्स सहित आधुनिक परमाणु शस्त्रागार पर ज़ोर दे रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान न केवल अपने परमाणु हथियारों और कमांड‑एंड‑कंट्रोल सिस्टम का आधुनिकीकरण कर रहा है, बल्कि WMD‑उपयोगी सामान और तकनीक के लिए विदेशों से सप्लाई भी हासिल करता है, जिसमें चीन प्रमुख स्रोत के रूप में चिन्हित है।

मिसाइल प्रोग्राम और अमेरिकी प्रतिबंध: क्यों बढ़ी चिंता?

दिसंबर 2024 में अमेरिका ने पाकिस्तान के लंबी दूरी के बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम से जुड़े चार पाकिस्तानी संस्थानों पर प्रतिबंध लगाए और साफ कहा कि पाकिस्तान ऐसी मिसाइल क्षमता विकसित कर रहा है जो “दक्षिण एशिया से बहुत आगे, संयुक्त राज्य अमेरिका तक” वार कर सके। अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के अनुसार, इस कार्यक्रम के तहत SHAHEEN जैसी मिसाइलों के लिए रॉकेट मोटर और अन्य अहम घटक हासिल किए जा रहे हैं, जिन्हें वॉशिंगटन “उभरता हुआ परमाणु खतरा” मान रहा है।

पाकिस्तानी रुख: ‘डबल स्टैंडर्ड’ और क्षेत्रीय स्थिरता का तर्क

इन प्रतिबंधों और अमेरिकी आरोपों पर पाकिस्तान की विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए इन्हें “पक्षपाती” और “भेदभावपूर्ण” बताया तथा कहा कि ऐसे कदम क्षेत्रीय रणनीतिक स्थिरता के लिए खतरनाक हैं। इस्लामाबाद लगातार दावा करता रहा है कि उसका मिसाइल और परमाणु कार्यक्रम केवल अपनी संप्रभुता की रक्षा और दक्षिण एशिया में संतुलन बनाए रखने के लिए है, जबकि अमेरिकी नॉन‑प्रोलिफरेशन नीति में “डबल स्टैंडर्ड” अपनाए जाते हैं।

भारत‑पाक‑चीन समीकरण और क्षेत्रीय सुरक्षा पर असर

अमेरिकी थ्रेट असेसमेंट रिपोर्टें लगातार संकेत दे रही हैं कि पाकिस्तान भारत को मुख्य खतरा मानकर न केवल पारंपरिक हथियारों बल्कि परमाणु और बैटलफील्ड न्यूक्लियर वेपन्स पर भी ज़ोर दे रहा है, जबकि भारत अपनी रणनीतिक प्राथमिकता में चीन को “प्राइमरी एडवर्सरी” और पाकिस्तान को सहायक/द्वितीयक खतरे के रूप में देखता है। चीन‑पाकिस्तान सामरिक साझेदारी, संयुक्त सैन्य अभ्यास और CPEC से जुड़ी संवेदनशीलता ने भी वॉशिंगटन की चिंता बढ़ाई है कि बीजिंग की तकनीकी मदद से इस्लामाबाद की मिसाइल और परमाणु क्षमता तेज़ी से आगे बढ़ सकती है।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *