जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप और अत्याधुनिक कंप्यूटर सिमुलेशन की मदद से ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक ऐसे एक्सोप्लैनेट की पहचान की, जो ज्ञात किसी भी ग्रह की श्रेणी में नहीं आता — यह एक पूरी तरह नए प्रकार का पिघला हुआ, सल्फर-युक्त सुपर-अर्थ है।
वैज्ञानिकों ने इसे L 98-59 d नाम दिया है — पृथ्वी से लगभग 35 प्रकाश-वर्ष की दूरी पर एक छोटे लाल बौने तारे (Red Dwarf Star) की परिक्रमा करता है। इस खोज को 16 मार्च 2026 को प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Nature Astronomy में प्रकाशित किया गया।
क्या खोजा गया?
- वैज्ञानिकों ने एल 98‑59 d (L 98‑59 d) नाम के एक्सोप्लानेट पर विस्तृत अध्ययन कर बताया है कि यह अब तक ज्ञात चट्टानी या पानी से भरपूर ग्रहों की श्रेणी में फिट नहीं बैठता।
- यह ग्रह हमारे सौर मंडल से बाहर, एक छोटे से लाल बौने तारे एल 98‑59 की परिक्रमा करता है और पृथ्वी से लगभग 35 प्रकाश वर्ष दूर स्थित है।
- यह ग्रह आकार में पृथ्वी से लगभग 1.6 गुना बड़ा है, लेकिन घनत्व अपेक्षाकृत कम है, जो इसके भीतर पिघली हुई चट्टान और गैसों की अनोखी संरचना की ओर इशारा करता है।
मुख्य तथ्य — एक नज़र में
- ग्रह का नाम:L 98-59 d(एक्सोप्लैनेट)
- पृथ्वी से दूरी: लगभग35 प्रकाश-वर्ष
- आकार: पृथ्वी से 1.6 गुना बड़ा(सुपर-अर्थ श्रेणी)
- मेज़बान तारा: छोटा लाल बौना तारा (Red Dwarf)
- विशेषता: स्थायी मैग्मा महासागरऔर सल्फर-भरपूर वायुमंडल
- शोध नेतृत्व: ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय(Dr. Harrison Nicholls)
- प्रकाशन: Nature Astronomy, 16 मार्च 2026
- दूरबीन: James Webb Space Telescope (JWST)
पिघला हुआ, सल्फर से भरा ग्रह
- मॉडलों और अवलोकनों से पता चला है कि एल 98‑59 d का मेंटल पिघली हुई सिलिकेट चट्टान (लावा जैसा) है और इसकी सतह के नीचे हजारों किलोमीटर गहरा वैश्विक “मैग्मा महासागर” फैला है।
- यह विशाल मैग्मा महासागर ग्रह के अंदर सल्फर की बहुत बड़ी मात्रा को भूवैज्ञानिक समय‑मान पर फंसा कर रखता है, यानी अरबों वर्षों तक सल्फर इसी लावा महासागर में जमा रहता है।
- इसी कारण वैज्ञानिकों ने इसे “सुपर‑अर्थ” श्रेणी का वह पहला ज्ञात उदाहरण बताया है, जो पिघले हुए, सल्फर‑समृद्ध ग्रहों के एक बिल्कुल नए वर्ग का सदस्य हो सकता है।
बदबूदार सल्फर गैसों से भरा वायुमंडल
- जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) और ज़मीनी दूरबीनों के डेटा से इस ग्रह के वायुमंडल में हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S) और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) जैसी सल्फर‑समृद्ध गैसों के स्पष्ट संकेत मिले हैं।
- हाइड्रोजन सल्फाइड पृथ्वी पर सड़े हुए अंडों जैसी तेज बदबू देती है, इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर कोई वहां सूंघ सके, तो यह ग्रह “सड़े अंडों जैसी” बदबू वाला सल्फर‑विश्व लगेगा।
- शोध से पता चलता है कि तारे से आने वाली पराबैंगनी (UV) रोशनी इन गैसों पर रासायनिक प्रतिक्रिया करा कर ऊपरी वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड बनाती है, जबकि नीचे फैला मैग्मा महासागर इन गैसों का बड़ा भंडार बनकर उन्हें लगातार वायुमंडल में छोड़ता रहता है।
क्यों है यह खोज इतनी असाधारण?
अब तक खगोलविज्ञानी छोटे एक्सोप्लैनेट्स को मुख्यतः दो श्रेणियों में रखते थे — पहली, चट्टानी गैस-ड्वार्फ (Rocky Gas-Dwarf), जिनके पास हाइड्रोजन-हीलियम का वायुमंडल होता है, और दूसरी, जल-समृद्ध दुनिया (Water World), जिनमें गहरे महासागर और बर्फ होती है। परंतु L 98-59 d इन दोनों वर्गों में से किसी में भी फिट नहीं होता। इसके बजाय, यह भारी सल्फर अणुओं से भरपूर एक बिल्कुल अलग किस्म का ग्रह है।
जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) और ज़मीनी वेधशालाओं के नवीनतम अवलोकनों ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया — इस ग्रह का घनत्व (Density) अपने आकार की तुलना में असामान्य रूप से कम है, और इसके वायुमंडल में हाइड्रोजन सल्फाइड (H₂S) की भारी मात्रा मौजूद है। 2024 के JWST अवलोकनों ने इसके ऊपरी वायुमंडल में सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) की भी उपस्थिति दर्ज की थी।
“यह खोज बताती है कि खगोलविज्ञानी जिन श्रेणियों में छोटे ग्रहों को रखते आए हैं, वे बहुत सरल और अपर्याप्त हो सकती हैं। यह पिघला हुआ ग्रह जीवन के लिए उपयुक्त नहीं है, लेकिन यह सौर मंडल से परे दुनियाओं की विशाल विविधता को दर्शाता है। हम पूछ सकते हैं — अभी और कितने प्रकार के ग्रह खोजे जाने बाकी हैं?”
— डॉ. हैरिसन निकोल्स, मुख्य शोधकर्ता, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय
मैग्मा के गहरे महासागर में छुपा रहस्य
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, यूनिवर्सिटी ऑफ ग्रोनिंगन, यूनिवर्सिटी ऑफ लीड्स और ETH ज्यूरिख के वैज्ञानिकों की संयुक्त टीम ने उन्नत कंप्यूटर सिमुलेशन की सहायता से इस ग्रह का लगभग पाँच अरब वर्षों का इतिहास पुनर्निर्मित किया। टेलीस्कोप अवलोकनों को ग्रह के आंतरिक ढाँचे और वायुमंडल के विस्तृत भौतिक मॉडलों से जोड़कर उन्होंने यह जानने में सफलता पाई कि इस ग्रह के अंदर आखिर क्या हो रहा है।
शोध के निष्कर्ष चौंकाने वाले हैं: L 98-59 d का मेंटल (Mantle) पिघले सिलिकेट से बना है — ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी पर लावा होता है। और इसकी सतह के नीचे हज़ारों किलोमीटर गहरा एक वैश्विक मैग्मा महासागर (Global Magma Ocean) मौजूद है। यह विशाल पिघला हुआ जलाशय ग्रह को भूवैज्ञानिक कालमापों पर अपने अंदर अत्यधिक मात्रा में सल्फर संग्रहीत करने में सक्षम बनाता है।
यह मैग्मा महासागर ग्रह को एक हाइड्रोजन-समृद्ध, सल्फर-युक्त वायुमंडल बनाए रखने में भी मदद करता है। सामान्यतः मेज़बान तारे से निकलने वाली X-किरणों के कारण ऐसा वायुमंडल अंतरिक्ष में विलीन हो जाता, लेकिन L 98-59 d का मैग्मा महासागर इसे संरक्षित रखता है।
ग्रह का अतीत: एक अलग दुनिया
कंप्यूटर मॉडलों के अनुसार, अरबों साल पहले L 98-59 d का स्वरूप संभवतः बिल्कुल अलग था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह शायद एक बड़े सब-नेप्च्यून जैसे ग्रह के रूप में जन्मा था। समय के साथ यह ठंडा होकर सिकुड़ता गया और इसने अपने अधिकांश वायुमंडल को खो दिया। इस प्रक्रिया ने, मैग्मा महासागर में सल्फर के गहरे संग्रह के साथ मिलकर, L 98-59 d को वह अनूठा, सल्फरीय वायुमंडल दिया, जो वैज्ञानिकों ने इससे पहले कभी नहीं देखा था।
“हमारे कंप्यूटर मॉडल विभिन्न ग्रहीय प्रक्रियाओं का अनुकरण करते हैं और प्रभावी रूप से हमें समय में पीछे जाकर यह समझने में सक्षम करते हैं कि यह असामान्य चट्टानी एक्सोप्लैनेट कैसे विकसित हुआ। हाइड्रोजन सल्फाइड गैस — जो सड़े अंडों जैसी गंध के लिए जानी जाती है — वहाँ एक प्रमुख भूमिका निभाती प्रतीत होती है।”
— डॉ. रिचर्ड चटर्जी, सह-लेखक, ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय
जीवन की संभावना और आगे की खोज
- एल 98‑59 d की सतह अत्यधिक गर्म, पिघली हुई लावा से ढकी और वायुमंडल सल्फर गैसों से भरा होने के कारण वैज्ञानिकों का मानना है कि यहां हमारी तरह के जीवन की संभावना बेहद कम है।
- फिर भी, यह ग्रह यह समझने के लिए एक “प्राकृतिक प्रयोगशाला” बन गया है कि किस तरह ग्रहों के अंदरूनी भाग (मैग्मा महासागर) और वायुमंडल के बीच रासायनिक आदान‑प्रदान अरबों वर्षों तक चलकर किसी ग्रह की बनावट और माहौल को आकार देते हैं।
- वैज्ञानिकों का अनुमान है कि आकाशगंगा में ऐसे सल्फर‑समृद्ध, पिघले हुए सुपर‑अर्थ ग्रहों की संख्या काफी हो सकती है और भविष्य में JWST सहित अगली पीढ़ी के टेलिस्कोप इनकी और अधिक पहचान कर सकेंगे।
ब्रह्मांड में और भी हो सकते हैं ऐसे ग्रह
शोधकर्ताओं का मानना है कि L 98-59 d शायद इस व्यापक श्रेणी का पहला ज्ञात सदस्य है। उनके अनुसार, हमारी आकाशगंगा में दीर्घजीवी मैग्मा महासागरों वाले गैस-समृद्ध सल्फरीय ग्रहों की एक बड़ी आबादी हो सकती है — जिसका अर्थ है कि हमारी आकाशगंगा में दुनियाओं की विविधता पहले की कल्पना से कहीं अधिक हो सकती है।
ऑक्सफोर्ड के सह-लेखक प्रोफेसर रेमंड पियरेहुम्बर्ट ने कहा, “जो बात रोमांचक है वह यह है कि हम ऐसे ग्रह के छुपे हुए आंतरिक भाग को उजागर करने के लिए कंप्यूटर मॉडलों का उपयोग कर सकते हैं, जहाँ हम कभी नहीं जा सकते। हालाँकि खगोलविज्ञानी दूर से केवल ग्रह का आकार, द्रव्यमान और वायुमंडलीय संरचना माप सकते हैं, लेकिन यह शोध दिखाता है कि इन अजनबी दुनियाओं के गहरे अतीत को पुनर्निर्मित करना और हमारे अपने सौर मंडल में किसी भी चीज़ से बिल्कुल अलग ग्रहों के प्रकारों की खोज करना संभव है।”
भविष्य की योजना: Ariel और PLATO मिशन
JWST से प्राप्त आँकड़ों की बाढ़ जारी है, और भविष्य में आने वाले Ariel और PLATO मिशनों से और भी अधिक डेटा मिलने की उम्मीद है। शोध दल इन नए मापों पर अपने सिमुलेशन लागू करने और मशीन लर्निंग पद्धतियों का उपयोग करके सौर मंडल से परे दुनियाओं की विविधता का मानचित्रण करने की योजना बना रहा है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि ग्रह कैसे बनते हैं, कैसे विकसित होते हैं, और कौन से ग्रह जीवन के लिए उपयुक्त हो सकते हैं।
हालाँकि L 98-59 d पर जीवन की संभावना नगण्य है, फिर भी इस खोज ने ग्रह विज्ञान की हमारी समझ को नया आयाम दिया है। यह हमें याद दिलाती है कि ब्रह्मांड हमारी कल्पना से कहीं ज़्यादा विविध और रहस्यमय है।













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