झारखंड के सुबर्णरेखा नदी में मिला द्वितीय विश्व युद्ध का 227 किलो का अमेरिकी बम, सेना ने कंट्रोल्ड ब्लास्ट से डिफ्यूज किया

झारखंड के बहरागोड़ा में सुबर्णरेखा नदी किनारे विश्व युद्ध काल के 227 किलो के बम को डिफ्यूज करती भारतीय सेना की टीम

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा में सुबर्णरेखा नदी किनारे खुदाई के दौरान मिले द्वितीय विश्व युद्ध काल के दो अमेरिकी बमों को भारतीय सेना की विशेषज्ञ टीम ने नियंत्रित विस्फोट के जरिए सफलतापूर्वक निष्क्रिय कर दिया। दोनों बम AN‑M64 मॉडल के थे, जिनका वजन करीब 227–227 किलो था और इन्हें अत्यंत विनाशकारी श्रेणी का हाई‑इम्पैक्ट एरियल बम माना जाता है।

कहां और कैसे मिले अमेरिकी बम

ये बम झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के बहरागोड़ा प्रखंड स्थित पानीपाड़ा–नागुडसाई (Panipara–Nagudsaai) इलाके में सुबर्णरेखा नदी के किनारे बालू की खुदाई के दौरान मिले। पहला बम 17 मार्च को बरामद हुआ, जबकि दूसरा बम कुछ दिनों बाद पास के ही स्थान से मिला, जिससे पूरे क्षेत्र में दहशत फैल गई। बरामद बमों पर ‘AN‑M64’ और ‘Made in America’ अंकित था, जिसके आधार पर विशेषज्ञों ने इन्हें अमेरिकी एरियल बम के रूप में चिह्नित किया।

द्वितीय विश्व युद्ध काल का अमेरिकी बम

प्रारंभिक जांच में सुरक्षा एजेंसियों और सैन्य विशेषज्ञों ने इन बमों को द्वितीय विश्व युद्ध काल का बताया, हालांकि आधिकारिक पुष्टि की प्रक्रिया अभी जारी है। AN‑M64 मॉडल के ये 500 पाउंड (लगभग 227 किलो) के बम युद्ध के समय बड़े इलाकों को भारी नुकसान पहुंचाने के लिए उपयोग किए जाते थे और इन्हें हाई‑इम्पैक्ट कैटेगरी में रखा जाता है। अनुमान है कि ये बम करीब 80 वर्ष से नदी की रेत और मिट्टी की परतों के नीचे दबे हुए थे और बालू खनन के दौरान सतह पर आए।

सेना की विशेष टीम ने संभाला मोर्चा

जैसे ही स्थानीय पुलिस और जिला प्रशासन को बम मिलने की सूचना मिली, क्षेत्र को तुरंत घेराबंदी कर संवेदनशील जोन घोषित कर दिया गया और भारतीय सेना की विशेषज्ञ बम निरोधक टीम को बुलाया गया। रांची स्थित 51 इंजीनियर रेजिमेंट की बम डिस्पोजल टीम, लेफ्टिनेंट कर्नल धर्मेंद्र सिंह और कैप्टन आयुष कुमार सिंह के नेतृत्व में, मौके पर पहुंची और ऑपरेशन की कमान संभाली। टीम में प्रशिक्षित बम निरोधक विशेषज्ञों के साथ उन्नत उपकरणों और सेफ्टी गियर का इस्तेमाल किया गया।

10–15 फीट गहरा गड्ढा, सैंडबैग और कंट्रोल्ड ब्लास्ट

सेना की टीम ने पहले बमों की संरचना, हालत और आसपास के भूभाग का विस्तृत सर्वे किया और फिर सुरक्षित तरीके से निपटान की योजना बनाई। जेसीबी की मदद से करीब 10–15 फीट गहरा गड्ढा खोदा गया, उसमें दोनों बमों को सावधानी से रखकर चारों ओर सैकड़ों रेत भरे बोरे (सैंडबैग) लगा कर मजबूत सुरक्षा घेरा तैयार किया गया, ताकि विस्फोट की ऊर्जा सीमित दायरे में रहे। इसके बाद बमों को रिमोट कंट्रोल के जरिए नियंत्रित विस्फोट (कंट्रोल्ड डिटोनेशन) से एक‑एक कर निष्क्रिय किया गया, जिसके दौरान जोरदार धमाकों की आवाजें दूर‑दूर तक सुनाई दीं और धुएं के बादल उठते देखे गए।

1 से 1.5 किमी क्षेत्र खाली, ड्रोन से निगरानी

ऑपरेशन शुरू होने से पहले प्रशासन ने बम मिलने वाली जगह के आसपास 1 से 1.5 किलोमीटर के दायरे को पूरी तरह सील कर दिया और गांवों के लोगों को अस्थायी तौर पर सुरक्षित स्थानों पर शिफ्ट किया। खेतों में काम कर रहे मजदूरों और नदी किनारे बालू खनन से जुड़े लोगों को भी तत्काल वहां से हटाया गया और इलाके में पुलिस, झारखंड जगुआर, फायर ब्रिगेड और स्वास्थ्य विभाग की टीमों को तैनात किया गया। पूरी प्रक्रिया के दौरान ड्रोन की मदद से क्षेत्र की निगरानी की गई, ताकि कोई भी व्यक्ति खतरे के क्षेत्र में न पहुंच सके और विस्फोट के प्रभाव पर रियल‑टाइम नजर रखी जा सके।

पुलिस, BDDS और सेना की समन्वित कार्रवाई

शुरुआत में मामले को झारखंड पुलिस की बम डिटेक्शन एंड डिस्पोजल स्क्वाड (BDDS) ने संभाला, जिसने मौके का निरीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि यह अत्यधिक शक्तिशाली और अब भी ‘एक्टिव’ बम है, जिसे सामान्य विस्फोटकों की तरह डिस्पोज नहीं किया जा सकता। इसके बाद पूर्वी सिंहभूम पुलिस ने सेना की विशेषज्ञ बम निरोधक यूनिट से औपचारिक रूप से मदद मांगी और सभी आवश्यक अनुमोदन व प्रक्रिया पूरी की गई। ऑपरेशन के दौरान झारखंड पुलिस के साथ‑साथ पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल पुलिस ने भी सीमा क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को कड़ा रखा, ताकि भीड़ नियंत्रण और यातायात प्रबंधन सुचारु रहे।

स्थानीय लोगों ने ली राहत की सांस

कई दिनों तक बम मिलने और उसके जिंदा होने की खबर से पानीपाड़ा, नागुडसाई और आसपास के गांवों में दहशत का माहौल था, लोग नदी किनारे जाने से परहेज कर रहे थे और रात में डर का माहौल बना रहता था। सेना द्वारा सफलतापूर्वक दोनों बमों को निष्क्रिय किए जाने के बाद गांव वालों ने सेना और प्रशासन के प्रति आभार जताया और तालियां बजाकर जवानों का स्वागत किया। स्थानीय प्रतिनिधियों और अधिकारियों ने भी इस ऑपरेशन को इतिहास में दर्ज किए जाने लायक बताया, क्योंकि जिंदा और हाई‑इम्पैक्ट क्षमता वाले इतने भारी बमों को बिना किसी जन‑हानि के निष्प्रभावी बनाना आसान नहीं था।

जांच और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर मंथन

सुरक्षा एजेंसियां अब इस बात की तहकीकात कर रही हैं कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय के ये अमेरिकी बम इस इलाके तक कैसे पहुंचे और इतने वर्षों तक रेत में दबे रहने के बाद भी एक्टिव कैसे बने रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यह इलाका उस दौर में एयर ऑपरेशन के किसी रूट या ड्रिल का हिस्सा रहा होगा, जहां से गुजरते समय बम किसी कारणवश गिरा होगा या उसे जानबूझकर डंप किया गया होगा, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी। फिलहाल, प्रशासन ने सुबर्णरेखा नदी किनारे बालू खनन और खुदाई गतिविधियों पर कड़ी निगरानी के निर्देश दिए हैं, ताकि अगर भविष्य में भी ऐसे किसी और विस्फोटक की संभावना हो तो समय रहते उसे पकड़ा जा सके।

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