मोतिहारी : बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के कैथवलिया गांव में स्थित निर्माणाधीन विराट रामायण मंदिर में आज भारतीय आध्यात्मिकता का एक अभूतपूर्व क्षण साकार हुआ। माघ कृष्ण चतुर्दशी की पवित्र तिथि पर विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की विधि-विधान से स्थापना का महान अनुष्ठान संपन्न हुआ। यह स्थापना न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि इंजीनियरिंग, कला और आध्यात्मिकता का एक अद्भुत संगम भी है।
महाशिवलिंग: आकार और भव्यता का प्रतीक
आज जिस शिवलिंग की स्थापना की गई, वह पूरी दुनिया में अपनी विशालता और भव्यता के लिए अद्वितीय है। तमिलनाडु के महाबलीपुरम में काली ग्रेनाइट के एकल पत्थर से तराशा गया यह शिवलिंग 33 फीट ऊंचा, 33 फीट परिधि वाला और 210 टन वजनी है। इस विशाल मूर्ति पर 1008 छोटे-छोटे शिवलिंग की नक्काशी की गई है, जिसे सहस्रलिंगम (हजार लिंग) कहा जाता है। इस मूर्ति को बनाने में लगभग दस वर्षों का समय लगा और इसके निर्माण में सर्वश्रेष्ठ कारीगरों की दक्षता का परिचय मिलता है।
यह शिवलिंग महाबलीपुरम से 45 दिनों की लंबी और दुरूह यात्रा के बाद बिहार पहुंचा। लगभग 2500 किलोमीटर की दूरी तय करते हुए, यह विशाल खंड तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश से होकर गया। इसकी यात्रा के दौरान लोगों ने महादेव का आशीर्वाद माना।
माघ कृष्ण चतुर्दशी: धार्मिक महत्व और आध्यात्मिक समर्पण
17 जनवरी की तिथि का चयन पूरी तरह से धार्मिक और खगोलीय महत्व पर आधारित है। आज का दिन माघ कृष्ण चतुर्दशी है, जिसे नरक निवारण चतुर्दशी भी कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार, यह वह रात है जब भगवान शिव ने पहली बार शिवलिंग रूप में प्रकट हुए थे और लिंग के रूप में उनकी पूजा शुरू हुई थी। प्राचीन ईशान संहिता में भी इस तिथि का विशेष महत्व वर्णित है।
मंदिर प्राधिकारियों के अनुसार, यह तिथि महाशिवरात्रि जितनी ही पवित्र और महत्वपूर्ण है। खगोलीय दृष्टि से भी यह दिन अत्यंत शुभ माना गया है, क्योंकि ग्रहों की विशेष स्थिति इस दिन बनी है। हजार वर्षों में शायद ही कोई ऐसा अवसर आता है जब विश्व के सबसे बड़े शिवलिंग की स्थापना इस तरह के पवित्र संयोग में संपन्न हो। विराट रामायण मंदिर के प्राधिकारियों का मानना है कि पिछले हजार वर्षों में ऐसी भव्य और विशाल शिवलिंग की स्थापना का कोई उदाहरण नहीं मिलता।
वैदिक परंपरा और प्राचीन अनुष्ठान
आज के अनुष्ठान में वैदिक परंपरा का पूर्ण पालन किया गया। प्रसिद्ध वैदिक विद्वान पंडित भवनाथ जी ने इस महान समारोह का नेतृत्व किया। समस्तीपुर की सांसद शांभवी चौधरी और उनके पति सायण कुणाल यजमान के रूप में उपस्थित रहे और अनुष्ठान के प्रमुख भूमिका निभाई।
महावीर मंदिर से 7 पंडितों के अलावा, काशी, अयोध्या, गुजरात, हरिद्वार और महाराष्ट्र से आए प्रख्यात विद्वानों ने पीठ पूजा का संचालन किया। सभी चारों वेदों के विद्वान और आगम शास्त्र के ज्ञाता इस महान यज्ञ में शामिल थे। सुबह 8:30 बजे से शुरू हुए अनुष्ठान में प्राचीन मंत्रों का उच्चारण गूंजता रहा और भक्तिमय माहौल बना रहा।
पवित्र अभिषेक: पांच पवित्र नदियों का जल
शिवलिंग की स्थापना के बाद उसका अभिषेक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। आज के समारोह में शिवलिंग का अभिषेक भारत की सबसे पवित्र नदियों के जल से किया गया। कैलाश मानसरोवर, गंगोत्री, हरिद्वार, प्रयागराज और सोनपुर से लाया गया जल इस अभिषेक में प्रयुक्त किया गया। वास्तव में, आठ से अधिक पवित्र नदियों के जल का उपयोग किया गया, जो भारत की सभी प्रमुख पवित्र जलधाराओं का प्रतीक है।
इस अभिषेक का आध्यात्मिक अर्थ यह है कि यह शिवलिंग पूरे भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा को धारण करेगा। प्रत्येक नदी का अपना दिव्य महत्व है और उनके जल का संयोजन एक सार्वभौमिक पवित्रता का संदेश देता है।
दिव्य संरचना: अष्टकमल यंत्र और आठ दिशाएं
अनुष्ठान में अष्टकमल यंत्र का प्रयोग किया गया, जो प्राचीन वास्तु और तांत्रिक विज्ञान का प्रतीक है। इस यंत्र के आठ दिशाओं में भगवान शिव के आठ दिव्य रूपों की स्थापना की गई, जबकि केंद्र में भगवान शिव और देवी पार्वती को हजार रूपों में (सहस्रलिंगम) प्रतिष्ठित किया गया।
यह व्यवस्था प्राचीन शास्त्रों के अनुसार की गई है। आठ दिशाएं आठ पालकों (अष्ट दिकपालों) का प्रतीक हैं, जो ब्रह्मांड की रक्षा करते हैं। इस प्रकार, यह शिवलिंग न केवल एक धार्मिक प्रतीक है, बल्कि पूरे ब्रह्मांड की दिव्य ऊर्जा को अपने में समाहित करता है।
पद्मश्री आचार्य किशोर कुणाल का स्वप्न
यह महान परियोजना स्वर्गीय पद्मश्री आचार्य किशोर कुणाल का दीर्घकालीन स्वप्न था। वे महावीर मंदिर ट्रस्ट के पूर्व सचिव थे और एक प्रख्यात पूर्व आईपीएस अधिकारी भी रहे थे। उन्होंने लगभग दस साल पहले इसी शिवलिंग के निर्माण का आदेश दिया था। आचार्य किशोर कुणाल की दूरदर्शी सोच और अद्भुत संगठन क्षमता के कारण ही यह भव्य परियोजना संभव हो सकी।
दुर्भाग्यवश, आचार्य किशोर कुणाल का निधन दिसंबर 2024 में हुआ, लेकिन उनके द्वारा स्थापित महावीर मंदिर ट्रस्ट उनके स्वप्न को पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध है। आज का समारोह उनके जीवन का एक महान स्मृति चिन्ह बन गया है।
विराट रामायण मंदिर परियोजना: भव्यता और आकार
शिवलिंग की स्थापना विराट रामायण मंदिर परियोजना का एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह मंदिर पूर्वी चंपारण के कैथवलिया गांव में लगभग 120-125 एकड़ भूमि पर निर्मित हो रहा है।
इस महान परियोजना की विशेषताएं इसे विश्व के सबसे बड़े मंदिरों में से एक बनाती हैं:
| विशेषता | विवरण |
|---|---|
| मुख्य मंदिर ऊंचाई | 270 फीट (आयोध्या के राम मंदिर से लगभग तीन गुना बड़ा) |
| कुल क्षेत्र | 1080 फीट लंबाई × 540 फीट चौड़ाई |
| शिखर संख्या | 12 शिखर, जिनमें मुख्य शिखर 270 फीट ऊंचा |
| मंदिर संख्या | 22 गर्भगृह और 18 मंदिर |
| परियोजना लागत | 500 करोड़ रुपये |
| पूर्ण होने की तारीख | 2030 तक |
यह मंदिर परिसर आंग्कोर वाट (कंबोडिया), रामनाथस्वामी मंदिर (रामेश्वरम) और मीनाक्षी सुंदरेश्वर मंदिर (मदुरै) जैसे विश्व प्रसिद्ध मंदिरों से प्रेरित है। इसके बाहरी दीवारों में रामायण के दृश्यों की जटिल नक्काशी की गई है।
राजनीतिक उपस्थिति और जन समर्थन
आज के समारोह में बिहार की राजनीतिक शीर्षस्थ नेतृत्व ने भाग लिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं इस अनुष्ठान में उपस्थित रहे और मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना की। उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा और सम्राट चौधरी भी इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने।
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस मंदिर को धार्मिक और पर्यटन दृष्टि से महत्वपूर्ण बताया और कहा कि इसके निर्माण से क्षेत्र के विकास को नई गति मिलेगी। राष्ट्रीय स्तर पर भी इस परियोजना को महत्व दिया गया है। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नबीन भी इस समारोह में शामिल हुए।
आस-पास के क्षेत्रों से लाखों श्रद्धालु इस दिव्य क्षण के साक्षी बनने के लिए दूरदराज से आए। राम-जानकी पथ पर लोगों की भीड़ का सिलसिला चलता रहा। हर ओर “हर हर महादेव” के जयकारे गूंजते रहे।
तकनीकी उपलब्धि और आधुनिक व्यवस्था
शिवलिंग की स्थापना एक अद्भुत तकनीकी उपलब्धि थी। इसके लिए 700 टन और 500 टन क्षमता वाली दो विशाल क्रेन का प्रयोग किया गया। शुक्रवार को इस प्रक्रिया का मॉक ड्रिल भी किया गया था, ताकि कोई त्रुटि न हो सके।
मंदिर परिसर में आधुनिक सुविधाएं भी उपलब्ध कराई गई थीं। चार LED स्क्रीन लगाए गए थे, ताकि दूर बैठे लोग भी इस महान अनुष्ठान को लाइव देख सकें। हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा की गई, जो इस अनुष्ठान की विशेषता थी।
जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क था। सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे, पार्किंग के लिए अलग-अलग स्थलों को चिन्हित किया गया था, और ट्रैफिक कंट्रोल की विस्तृत योजना बनाई गई थी।
भारतीय आध्यात्मिकता का प्रतीक
आज का यह समारोह न केवल बिहार के लिए, बल्कि पूरे भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक मील का पत्थर है। अयोध्या में राम लला के विराजमान होने के बाद अब बिहार का चंपारण भी पूरी दुनिया के लिए आस्था का केंद्र बन गया है।
इस शिवलिंग की स्थापना भारतीय सनातन परंपरा, वैदिक ज्ञान और आधुनिक इंजीनियरिंग का एक अद्भुत मिश्रण है। यह प्रमाण है कि भारत की प्राचीन सभ्यता आज भी अपनी भव्यता और शक्ति बनाए रखे हुए है।
भविष्य में जब यह विशाल मंदिर परिसर पूरी तरह से तैयार हो जाएगा, तो यह न केवल एक धार्मिक केंद्र होगा, बल्कि एक महान सांस्कृतिक विरासत भी होगी जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देगा।












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