संसद के शीतकालीन सत्र में वंदे मातरम के 150वें वर्षगांठ पर विशेष चर्चा पर हंगामा: पीएम मोदी का कांग्रेस पर टुकड़े करने का आरोप

PM Narendra Modi addressing Lok Sabha on Vande Mataram 150th anniversary debate, 8 December 2025 Winter Session

संसद के शीतकालीन सत्र का छठा दिन ऐतिहासिक बहस के लिए याद रखा जाएगा। 8 दिसंबर 2025 को लोकसभा में राष्ट्रगान वंदे मातरम के 150वें वर्षगांठ पर विशेष चर्चा की शुरुआत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रभावशाली भाषण से हुई। यह चर्चा न केवल एक ऐतिहासिक गीत के महत्व को लेकर थी, बल्कि यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय पहचान, स्वतंत्रता संग्राम की विरासत और सत्ता-विपक्ष के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोप का भी प्रतीक बन गई।

प्रधानमंत्री मोदी का ऐतिहासिक भाषण: मुख्य बिंदु

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में लगभग 45 मिनट तक अपना भाषण दिया, जिसमें उन्होंने वंदे मातरम को लेकर कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। उनके भाषण के प्रमुख बिंदु इस प्रकार थे:

वंदे मातरम को स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा का स्रोत बताया

पीएम मोदी ने कहा कि “वंदे मातरम ने पूरे देश को शक्ति और प्रेरणा दी”। उन्होंने बताया कि यह मंत्र केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का नारा नहीं था, बल्कि यह “भारत माता को औपनिवेशिकता के अवशेषों से मुक्त करने के लिए एक पवित्र युद्धघोष” था। प्रधानमंत्री ने कहा कि लाखों लोगों ने इसी जयघोष के साथ आजादी का आंदोलन चलाया और इसी का परिणाम है कि आज हम सभी यहां बैठे हैं।

कांग्रेस पर 1937 के फैसले को लेकर तीखा हमला

सबसे विवादास्पद हिस्सा तब आया जब पीएम मोदी ने कांग्रेस पर वंदे मातरम के साथ समझौता करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “तुष्टिकरण की राजनीति के दबाव में कांग्रेस ने वंदे मातरम के विभाजन के लिए झुकना पड़ा, और इसलिए एक दिन भारत के विभाजन के लिए भी झुकना पड़ा”

पीएम मोदी ने कांग्रेस पर यह भी आरोप लगाया कि जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में 1937 में कांग्रेस ने धार्मिक आधार पर वंदे मातरम के कुछ अनुच्छेद हटा दिए थे। उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने वंदे मातरम के कुछ श्लोकों को हटा दिया, जिनमें मां दुर्गा की प्रशंसा की गई थी”। इस फैसले को उन्होंने “ऐतिहासिक पाप और भूल” करार दिया।

आइए जानते हैं वन्दे मातरम् पूरा गीत – हिंदी अनुवाद और अर्थ

1857 की क्रांति और बंगाल का जिक्र

प्रधानमंत्री ने 1857 की क्रांति का उल्लेख करते हुए कहा कि ब्रिटिश समझ गए थे कि 1857 के बाद भारत को नियंत्रित करना मुश्किल होगा। उन्होंने कहा, “ब्रिटिश ने ‘विभाजित करो और राज करो’ की नीति अपनाई, और बंगाल को उनका प्रयोगशाला बनाया”। उन्होंने बताया कि उस समय बंगाल की बौद्धिक शक्ति ने देश का मार्गदर्शन किया।

वंदे मातरम को आत्मनिर्भर भारत से जोड़ा

पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम ने न केवल स्वतंत्रता का संकल्प दिया, बल्कि यह “आत्मनिर्भरता का मंत्र” भी बना। उन्होंने बताया कि उस समय माचिस के डिब्बे से लेकर बड़े जहाजों तक ‘वंदे मातरम’ लिखा जाता था। यह विदेशी वस्तुओं को चुनौती देने का साधन बन गया।

2047 के विकसित भारत का सपना

प्रधानमंत्री ने कहा कि जिस तरह स्वतंत्रता से 50 साल पहले कोई व्यक्ति स्वतंत्र भारत का सपना देख सकता था, उसी तरह हम 2047 से 25 साल पहले विकसित भारत का सपना देख सकते हैं। उन्होंने कहा, “यदि स्वतंत्रता से 50 साल पहले कोई स्वतंत्र भारत का सपना देख सकता था, तो 2047 से 25 साल पहले हम भी समृद्ध और विकसित भारत का सपना देख सकते हैं”

विपक्ष का पलटवार: प्रियंका गांधी की तीखी प्रतिक्रिया

विपक्ष की ओर से कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा ने सरकार पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा कि सरकार वंदे मातरम जैसे पवित्र गीत को “चुनावी हथियार” बना रही है।

चुनावी मकसद का आरोप

प्रियंका गांधी ने कहा, “हम वंदे मातरम पर चर्चा कर रहे हैं क्योंकि पश्चिम बंगाल के चुनाव आ रहे हैं। वे जनता के असली मुद्दों से ध्यान हटाना चाहते हैं”। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार देश को “अतीत में जीने” पर मजबूर कर रही है, जबकि वर्तमान और भविष्य के मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए।

“भारत की आत्मा का हिस्सा” बयान

प्रियंका ने कहा, “वंदे मातरम भारत की आत्मा का हिस्सा है, लेकिन यह सरकार इस पर पाप कर रही है”। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए बलिदान दिया, इस सरकार को उन पर नए आरोप लगाने का अवसर चाहिए।

बेरोजगारी और आर्थिक संकट का मुद्दा उठाया

कांग्रेस नेता ने कहा कि देश बेरोजगारी, महंगाई और आर्थिक संकट से जूझ रहा है, लेकिन सरकार इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए राष्ट्रीय गीत को विवादास्पद बना रही है। उन्होंने कहा, “यह सरकार देश का ध्यान जनता के आवश्यक मुद्दों से हटाना चाहती है”

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: वंदे मातरम का सफर

बंकिमचंद्र चटर्जी की रचना

वंदे मातरम को बंकिमचंद्र चटर्जी ने 1870 में संस्कृत और बंगला भाषा में लिखा था। यह गीत उनके उपन्यास “आनंदमठ” में शामिल था। 1896 में पहली बार कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन में इसे गाया गया था।

1937 का विवादास्पद फैसला

कांग्रेस कार्यसमिति ने 1937 में फैसला किया कि वंदे मातरम के केवल पहले दो श्लोकों को ही गाया जाएगा, क्योंकि बाकी भागों में धार्मिक छवियां थीं जिन पर कुछ लोगों को आपत्ति थी। इस फैसले को कांग्रेस ने “आजादी के आंदोलन में एकता बनाए रखने” के लिए उचित बताया था। रवींद्रनाथ टैगोर ने भी नेहरू को पत्र लिखकर केवल दो श्लोकों के उपयोग का समर्थन किया था।

ब्रिटिश शासन के दौरान प्रतिबंध

ब्रिटिश सरकार ने वंदे मातरम को अपराध घोषित कर दिया था, क्योंकि यह लोगों में राष्ट्रीय भावना जगाता था। इसे गाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों को जेल भेजा जाता था।

राज्यसभा में भी होगी चर्चा

लोकसभा के बाद राज्यसभा में 9 दिसंबर को भी वंदे मातरम पर चर्चा होनी है। गृह मंत्री अमित शाह राज्यसभा में इस चर्चा की शुरुआत करेंगे। सरकार ने दोनों सदनों में कुल 10 घंटे का समय आवंटित किया है, जिसमें से एनडीए को 3 घंटे मिले हैं।

सरकार की रणनीति: क्यों अब?

सरकार के सूत्रों के अनुसार, यह चर्चा एक वर्षीय राष्ट्रीय समारोह का हिस्सा है, जो 7 नवंबर 2025 को शुरू हुआ था। सरकार का दावा है कि इस बहस के दौरान वंदे मातरम से जुड़े कई “महत्वपूर्ण और अज्ञात पहलू” सामने आएंगे।

हालांकि, विपक्ष इसे पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनावों से जोड़कर देख रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सरकार वंदे मातरम के माध्यम से राष्ट्रवादी एजेंडे को मजबूत करना चाहती है और विपक्ष को रक्षात्मक स्थिति में लाना चाहती है।

विशेषज्षों की राय

राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह बहस राष्ट्रीय पहचान और इतिहास की व्याख्या पर सत्ता और विपक्ष के बीच लंबे समय से चल रही लड़ाई का नया अध्याय है। वंदे मातरम जैसे प्रतीकों का राजनीतिकरण भारत में कोई नई बात नहीं है, लेकिन इसे संसद के मंच पर इतने विस्तार से रखना एक रणनीतिक कदम है।

निष्कर्ष: विवाद का भविष्य

वंदे मातरम पर संसदीय बहस ने राष्ट्रीय चर्चा को गर्मा दिया है। जहां सरकार इसे ऐतिहासिक न्याय का मामला बता रही है, वहीं विपक्ष इसे “राजनीतिक हथियार” बनाने का आरोप लगा रहा है। इस बहस का असर आने वाले राज्य चुनावों में देखने को मिल सकता है, खासकर पश्चिम बंगाल में जहां इस तरह के राष्ट्रीय मुद्दों का बड़ा प्रभाव होता है।

संसदीय इतिहास में यह पहली बार नहीं है जब राष्ट्रीय प्रतीकों को लेकर गहरी राजनीतिक बहस हुई हो, लेकिन वंदे मातरम के 150वें वर्षगांठ पर इस तरह की व्यापक चर्चा निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक घटना है जिसे भविष्य में गंभीरता से याद किया जाएगा।


सूत्र: यह रिपोर्ट विभिन्न प्रमुख समाचार सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तैयार की गई है, जिनमें भारत सरकार की आधिकारिक प्रेस रिलीज, प्रधानमंत्री कार्यालय की घोषणाएं, और संसदीय कार्यवाही के सीधे प्रसारण शामिल हैं।

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