क्या ईरान होर्मुज की समुद्री केबलें काटकर पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद कर सकता है?

होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री इंटरनेट केबलें और ईरान का डिजिटल ब्लैकआउट खतरा — Iran Hormuz undersea cable internet shutdown infographic in Hindi

फारस की खाड़ी में बिछे फाइबर-ऑप्टिक केबलों का जाल वैश्विक इंटरनेट ट्रैफ़िक का 30% वहन करता है — युद्ध, समुद्री खदानें और मरम्मत जहाजों की अनुपस्थिति मिलकर एक ऐसा डिजिटल तूफान बना रहे हैं जो भारत समेत पूरी दुनिया को झकझोर सकता है

तेल और गैस के बाद अब एक और बड़ा खतरा — समुद्र के नीचे बिछे वे पतले फाइबर-ऑप्टिक तार जिन पर पूरी दुनिया की डिजिटल अर्थव्यवस्था टिकी है। ईरान और अमेरिका के बीच छिड़े युद्ध ने होर्मुज जलडमरूमध्य को सिर्फ एक ऊर्जा संकट का केंद्र नहीं बनाया है — यह अब दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल चोकपॉइंट में तब्दील हो चुका है।

28 फरवरी 2026 को अमेरिका-इज़रायल के हमलों के बाद शुरू हुए इस संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को एक सक्रिय युद्ध क्षेत्र में बदल दिया। ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने 3 मार्च 2026 को होर्मुज को बंद घोषित करते हुए कहा कि इससे गुजरने वाले किसी भी जहाज को “जलाकर भस्म” कर दिया जाएगा। इसके बाद से कम से कम पाँच टैंकर क्षतिग्रस्त हो चुके हैं और करीब 150 जहाज जलडमरूमध्य में फंसे पड़े हैं।

लेकिन दुनिया की नजर सिर्फ तेल पर है। समुद्र की गहराई में, इन्हीं पानियों के नीचे, एक और जाल बिछा है — फाइबर-ऑप्टिक केबलों का वह नेटवर्क जो एशिया, मध्य-पूर्व और यूरोप को डिजिटल रूप से जोड़ता है। अगर यह टूटा, तो इसके नतीजे तेल संकट से भी ज़्यादा गंभीर हो सकते हैं।

होर्मुज की नीचे क्या है? — समुद्री केबलों का अदृश्य नेटवर्क

अधिकांश लोग सोचते हैं कि इंटरनेट उपग्रहों (सैटेलाइट) से चलता है। लेकिन सच यह है कि दुनिया का 99% से अधिक इंटरनेट ट्रैफ़िक समुद्र की तलहटी में बिछे फाइबर-ऑप्टिक केबलों के जरिये चलता है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ अमित दुबे के शब्दों में, “ये केबल डिजिटल अर्थव्यवस्था की अदृश्य रीढ़ हैं — ई-मेल से लेकर बैंकिंग लेनदेन, क्लाउड सर्विस और AI — सब इन्हीं पर निर्भर है।”

होर्मुज से गुजरने वाली प्रमुख समुद्री केबलें

  • FLAG/EIG:यूरोप-भारत-खाड़ी को जोड़ने वाली प्रमुख केबल
  • SEA-ME-WE 3/4/5:सिंगापुर से फ्रांस तक — दुनिया की सबसे लंबी केबल प्रणालियों में से एक
  • EPEG (Europe-Persia Express Gateway):25,000 किमी — यूरोप से भारत तक
  • I-ME-WE / IMEWE:भारत-मध्य पूर्व-पश्चिमी यूरोप संपर्क
  • FALCON:FLAG Telecom संचालित, भारत-खाड़ी मार्ग
  • OMRAN:ओमान-ईरान के बीच 600 किमी की केबल
  • UAE-Iran Cables:UAE एक्सचेंज पॉइंट्स से ईरानी लैंडिंग स्टेशन तक
केबल का नामलंबाई / क्षमताकनेक्शनखतरा स्तर
SEA-ME-WE 4~20,000 किमीसिंगापुर ↔ फ्रांस (भारत होकर)🔴 अत्यधिक
FLAG / EIG~15,000 किमीभारत ↔ यूरोप🔴 अत्यधिक
EPEG25,000 किमीयूरोप ↔ भारत ↔ SE Asia🔴 अत्यधिक
I-ME-WE~13,000 किमीभारत ↔ मध्य-पूर्व ↔ यूरोप🟠 उच्च
2Africa Pearls45,000 किमी (निर्माणाधीन)अफ्रीका ↔ भारत ↔ खाड़ी🟡 अनिश्चित

क्यों है होर्मुज इतना खतरनाक चोकपॉइंट?

होर्मुज की विशेष भूगोलिक स्थिति इसे असाधारण रूप से कमज़ोर बनाती है। इस जलडमरूमध्य की अधिकतम गहराई केवल लगभग 200 फीट है। इसका मतलब है कि समुद्र की तलहटी में बिछी केबलें सतह के बेहद करीब हैं — जहाजों के एंकर, नौसैनिक ऑपरेशन या यहाँ तक कि समुद्री खदानें इन्हें आसानी से नुकसान पहुँचा सकती हैं।

TeleGeography के अनुसार, सभी केबलें ओमानी जल-क्षेत्र में बिछाई गई हैं क्योंकि ईरान के साथ ऐतिहासिक तनाव के कारण ईरानी पानियों में परमिट मिलना संभव नहीं था। लेकिन इससे एक और खतरा पैदा हुआ — इन केबलों का गुच्छा एक ही संकरे गलियारे में सिमट गया, जहाँ किसी एक हमले से कई केबलें एक साथ क्षतिग्रस्त हो सकती हैं।

“लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य के पानी सिर्फ ऊर्जा के गलियारे नहीं हैं — ये डिजिटल हाईवे भी हैं। यहाँ का कोई भी व्यवधान पूरी दुनिया की कनेक्टिविटी को प्रभावित कर सकता है।”

— अमित दुबे, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ, ETV Bharat

दोहरा संकट: होर्मुज + लाल सागर एक साथ बंद

यह संकट सिर्फ होर्मुज तक सीमित नहीं है। दक्षिण में, ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने ईरान के साथ एकजुटता जताते हुए लाल सागर में हमले फिर से शुरू कर दिए हैं — वह युद्धविराम तोड़ते हुए जो 2025 के अंत से लागू था। इसका मतलब है कि वैश्विक इंटरनेट के दो सबसे महत्वपूर्ण डिजिटल गलियारे — लाल सागर और होर्मुज — एक साथ युद्ध क्षेत्र बन गए हैं।

Submarine Networks के विशेषज्ञों का कहना है कि इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। सितंबर 2025 में लाल सागर में हुई केबल क्षति के बाद Microsoft Azure की सेवाओं में भारी देरी देखी गई थी — और उस वक्त कोई सीधा सैन्य संघर्ष भी नहीं था। अब दोनों मार्ग एक साथ बंद हैं।

ऐतिहासिक मिसाल: फरवरी 2024 में लाल सागर में हूती हमलों की वजह से एक जहाज के एंकर से AAE-1, Seacom और EIG केबलें टूट गई थीं। उनकी मरम्मत में लगभग छह महीने लगे। अब अगर होर्मुज में भी ऐसा हो तो मरम्मत जहाज वहाँ पहुँच भी नहीं सकते — क्योंकि यह सक्रिय युद्ध क्षेत्र है।

Meta, Google, Amazon के अरबों डॉलर खतरे में

खाड़ी क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में AI और क्लाउड कंप्यूटिंग का वैश्विक केंद्र बनने की राह पर था। Amazon, Microsoft और Google ने वहाँ विशाल डेटा सेंटर बनाए हैं। Meta की 2Africa Pearls परियोजना — एक 45,000 किमी लंबी केबल जो भारत, खाड़ी देशों और अफ्रीका को जोड़ने वाली थी — अब युद्ध के कारण ठप हो गई है।

Alcatel Submarine Networks (ASN), जो इस केबल को बिछाने का काम कर रही थी, ने force majeure घोषित कर दिया है — यानी वह कानूनी रूप से इस काम को जारी रखने में असमर्थ है। कंपनी ने कहा कि युद्ध क्षेत्र में जहाज भेजना “बहुत जोखिमपूर्ण” है। इसके अलावा, SEA-ME-WE 6 गल्फ एक्सटेंशन परियोजना, जो 2024 में पूरी होनी थी, भी अनिश्चित काल के लिए टल गई है।

भारत पर क्या होगा असर? — UPI से लेकर शेयर बाज़ार तक

भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से चिंताजनक है। होर्मुज जलडमरूमध्य भारत के पश्चिमी दिशा के इंटरनेट ट्रैफ़िक का एक तिहाई हिस्सा वहन करता है। भारत की SEA-ME-WE 4, I-ME-WE और FALCON जैसी केबलें इसी रास्ते से यूरोप तक जाती हैं।

बैंकिंग और UPI

अंतरराष्ट्रीय लेनदेन, SWIFT नेटवर्क और UPI के वैश्विक ऑपरेशन प्रभावित हो सकते हैं। ATM, नेट बैंकिंग में देरी संभव।

शेयर बाज़ार और फिनटेक

वैश्विक बाज़ारों से भारत की रियल-टाइम कनेक्टिविटी बाधित होने से ट्रेडिंग में लेटेंसी बढ़ेगी। विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाएगा।

Cloud और AI सेवाएँ

AWS, Azure और Google Cloud से जुड़ी सेवाएँ धीमी पड़ सकती हैं। भारत का $270 बिलियन डेटा सेंटर हब बनने का सपना खतरे में।

सोशल मीडिया और स्ट्रीमिंग

YouTube, Netflix, WhatsApp जैसी सेवाओं में धीमापन और बफरिंग की समस्या उत्पन्न हो सकती है। वीडियो कॉल्स प्रभावित होंगी।

Bharti Airtel के पास इन केबलों में हिस्सेदारी है। Reliance Jio की India-Europe-Express (IEX) और India-Asia-Express (IAX) परियोजनाएँ भी इसी क्षेत्र में हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैकल्पिक मार्गों में फिलहाल इतनी बैंडविड्थ क्षमता नहीं है कि वे पूरे ट्रैफ़िक को संभाल सकें।

क्या ईरान वास्तव में केबलें काट सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान के पास इसके लिए जरूरी क्षमता है। IRGC के पास पनडुब्बी तकनीक, समुद्री ड्रोन और बारूदी सुरंगें हैं। होर्मुज की उथली गहराई (200 फीट) केबलों को पहुँच में आसान बनाती है। 2013 में अलेक्जेंड्रिया के पास मिस्री अधिकारियों ने गोताखोरों को एक समुद्री केबल काटते हुए पकड़ा था — यह साबित करता है कि यह काम तकनीकी रूप से संभव है।

हालाँकि, उद्योग विश्लेषकों का कहना है कि ईरान द्वारा जानबूझकर केबलें काटने की संभावना अभी भी अनिश्चित है। अप्रत्यक्ष नुकसान — युद्धपोतों, एंकरों, मिसाइलों या समुद्री खदानों से — ज़्यादा संभावित खतरा है। Gulf News की रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक इंटरनेट पूरी तरह ठप होने की संभावना कम है, लेकिन क्षेत्रीय कनेक्टिविटी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती है।

“21वीं सदी में डिजिटल बुनियादी ढाँचे पर नियंत्रण उतना ही रणनीतिक है जितना समुद्री मार्गों या ऊर्जा स्रोतों पर नियंत्रण।”

— अजय शर्मा, AI गवर्नेंस और साइबर कानून विशेषज्ञ

मरम्मत क्यों नहीं हो सकती? — असली संकट

समुद्री केबल की मरम्मत कोई आसान काम नहीं है। विशेषज्ञ दल को पहले क्षतिग्रस्त हिस्सा ढूँढना होता है, फिर तलहटी से केबल को ऊपर लाना होता है, मरम्मत करनी होती है और फिर वापस बिछाना होता है। सामान्य परिस्थितियों में भी यह काम कई दिन लेता है। लेकिन अभी होर्मुज और लाल सागर दोनों युद्ध क्षेत्र हैं — मरम्मत जहाज वहाँ जा ही नहीं सकते।

TeleGeography के अनुसार, पूरी खाड़ी में अभी सिर्फ एक मरम्मत जहाज मौजूद है — बाकी लाल सागर और हिंद महासागर में हैं। अगर होर्मुज में कोई केबल टूटती है, तो उसकी मरम्मत महीनों तक नहीं हो सकती।

विकल्प क्या हैं? — आर्कटिक से लेकर जमीनी रास्ते तक

टेलीकॉम उद्योग और सरकारें विकल्प तलाश रही हैं, लेकिन कोई भी तत्काल समाधान नहीं है:

जमीनी केबल मार्ग (Terrestrial Routes)

सऊदी अरब, जॉर्डन और इज़रायल से होते हुए यूरोप तक जाने वाले भूमि मार्ग उपलब्ध हैं, लेकिन इनकी बैंडविड्थ समुद्री केबलों के मुकाबले बहुत कम है।

आर्कटिक केबल

एक विकल्प के रूप में आर्कटिक रूट पर विचार हो रहा है, लेकिन इसकी लागत सामान्य समुद्री केबल की दोगुनी है। बर्फ से नुकसान का खतरा अलग है और मरम्मत में तीन गुना अधिक समय लगता है।

Meta का Project Waterworth

Meta एक 50,000 किमी की केबल बना रहा है जो मध्य-पूर्व को पूरी तरह बाईपास करेगी — अमेरिका, भारत, दक्षिण अफ्रीका और ब्राज़ील को जोड़ेगी। लेकिन यह अभी वर्षों दूर है।

उपग्रह (Satellite)

SpaceX Starlink और अन्य LEO उपग्रह नेटवर्क बैकअप दे सकते हैं, लेकिन वे समुद्री केबलों की क्षमता और गति का विकल्प नहीं बन सकते।

ऐतिहासिक मिसालें — जब केबलें टूटी थीं

2008: मिस्र के पास भूमध्य सागर में SEA-ME-WE 4 और FLAG Europe-Asia केबलें कट गईं। मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया में इंटरनेट सेवाएँ ठप हो गईं या धीमी पड़ गईं।

2024: हूती हमलों में लाल सागर की AAE-1, Seacom और EIG केबलें क्षतिग्रस्त हुईं। एशिया, यूरोप और मध्य-पूर्व के बीच 25% ट्रैफ़िक बाधित हुआ। एक केबल की मरम्मत में पाँच महीने लगे।

2024-25: बाल्टिक सागर में कई केबलें रहस्यमय तरीके से काटी गईं — संदेह रूस समर्थित जहाजों पर था। इसने “grey-zone warfare” यानी अदृश्य डिजिटल युद्ध की नई अवधारणा को जन्म दिया।

क्या सच में पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद हो सकता है?

संक्षिप्त उत्तर है — नहीं, लेकिन इसकी ज़रूरत नहीं। पूरा इंटरनेट एक ही जगह से बंद नहीं होता। लेकिन अगर होर्मुज की प्रमुख केबलें टूट जाएँ और मरम्मत महीनों न हो सके, तो एशिया-यूरोप के बीच डेटा ट्रैफ़िक इतना धीमा हो जाएगा कि बैंकिंग, AI सेवाएँ, क्लाउड कंप्यूटिंग और ग्लोबल कम्युनिकेशन गंभीर रूप से प्रभावित होंगे।

Gulf News और TeleGeography के विशेषज्ञों के अनुसार, UAE जैसे देशों की केबलें Fujairah में उतरती हैं जो होर्मुज से थोड़ी दूर है, इसलिए उनपर तत्काल असर कम होगा। लेकिन कुवैत, बहरीन और कतर जैसे देशों के लिए जमीनी नेटवर्क भी पर्याप्त नहीं हैं।

वैश्विक AI पर असर: Amazon, Microsoft और Google के खाड़ी क्षेत्र में स्थित डेटा सेंटर — जो दुनियाभर के AI क्लाइंट्स को सेवा देते हैं — अगर इन केबलों से कट जाएँ, तो AI सेवाएँ अचानक ठप हो सकती हैं। यह सिर्फ इंटरनेट धीमा होने की बात नहीं — यह वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से के रुकने का संकट है।

निष्कर्ष: यह सिर्फ तेल का युद्ध नहीं है

होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट दुनिया को यह याद दिला रहा है कि आधुनिक सभ्यता कितनी नाजुक बुनियाद पर टिकी है — समुद्र की तलहटी में बिछे पतले फाइबर के तार। तेल और गैस की चिंता तो सबको दिखती है, लेकिन डिजिटल अर्थव्यवस्था की यह रीढ़ लगभग अदृश्य है — जब तक टूटे नहीं।

भारत के लिए यह संकट दोहरा है: एक तरफ ऊर्जा सुरक्षा, दूसरी तरफ डिजिटल कनेक्टिविटी। $270 बिलियन के डेटा सेंटर हब बनने का सपना देख रहे भारत को अब अपनी समुद्री केबल नीति पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा।

जैसा कि साइबर कानून विशेषज्ञ अजय शर्मा ने कहा — “21वीं सदी की असली ताकत वह है जो समुद्र की तलहटी को नियंत्रित करती है।” और अभी, वह तलहटी एक युद्ध क्षेत्र बन चुकी है।

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