Cloud Seeding (क्लाउड सीडिंग) एक Weather Modification प्रक्रिया है, जिसमें existing बादलों में specially selected seeding-agents (जैसे Silver Iodide, Sodium Chloride, Potassium Iodide या Dry Ice) छोड़े जाते हैं, ताकि बादल में मौजूद moisture को precipitation (वर्षा/बर्फ) में बदलने की प्रक्रिया को तेज किया जा सके।
Seed-agents act as condensation/ice nuclei, जिसके चारों ओर water vapour जमा हो जाता है, बूंदें बड़ी होती हैं, और अंततः वह धरातल पर गिरती हैं।
टेक्निक की दो मुख्य श्रेणियाँ हैं:
- Glaciogenic Seeding – सुपरकोल्ड (माइनस तापमान) बादलों में Silver Iodide या Dry Ice छोड़ा जाता है ताकि Ice crystals बने।
- Hygroscopic Seeding – गरम या नम बादलों में Salt-particles छोड़े जाते हैं, जिससे बूंदें बढ़कर वर्षा बनें।
विश्वभर में यह तकनीक drought-mitigation, snowfall-enhancement (हिमजल में बढ़ोतरी), hail-suppression, fog-clearance तथा air-quality improvement के लिए उपयोग की गई है।
कैसी क्लाउड स्थिति चाहिए? कौन-कौन से Conditions मायने रखते हैं?
क्लाउड सीडिंग तभी कार्य करेगा जब कुछ विशेष meteorological व cloud-microphysical conditions मौजूद हों:
- बादलों में प्रचुर मात्रा में नमी (liquid water content) होनी चाहिए। उदाहरणतः भारत में अध्ययन बताते हैं कि यदि बादल की vertical thickness < 1 km या liquid water content बहुत कम हो, तो सीडिंग न तो प्रभावी होती है।
- बादलों की ऊँचाई, तापमान, हवा का प्रवाह (wind shear, convergence) आदि अनुकूल होने चाहिए। यदि बहुत सूखी हवा बादल के नीचे हो, तो वर्षा बनने से पहले बूंदें वाष्पित हो सकती हैं।
- बादल पहले से मौजूद होने चाहिए — क्लाउड सीडिंग नए बादल नहीं बनाती, बल्कि मौजूदा बादलों को सक्रिय करती है।
- क्षेत्र-विशेष परिस्थिति मायने रखती है — उदाहरण के लिए, India के शुष्क सर्दियों-महीनों में Delhi जैसे स्थानों पर आवश्यक moisture-levels अक्सर नहीं मिल पातीं।
India में और बाहरी देशों में उपयोग और परिणाम
India में अनुभव:
- भारत में पहले कई राज्यों में क्लाउड-सीडिंग trials हुए हैं। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र राज्य में 11-वर्षीय “Warm Cloud Modification” अध्ययन में बताया गया कि favourable बादल (vertical thickness > 1 km, liquid water content > 0.5 g/m³) में सेडिंग के बाद वर्षा में 24 % तक की बढ़ोतरी हुई थी।
- दिल्ली-NCR के लिए चलाये जा रहे क्लाउड-सीडिंग प्रोजेक्ट में IIT Kanpur और कई विभाग जुड़े हैं। यहां 100 sq km क्षेत्र में, लगभग 90-मिनट की sorties द्वारा सीडिंग की योजना है।
- पर India में यह देखा गया है कि यदि moisture-level बहुत कम हो (उदाहरण के लिए ~20 %) या बादल अनुकूल नहीं हों, तो प्रभाव नगण्य रहा।
दुनिया में अनुभव:
- अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में हिम-जल (snowpack) बढ़ाने के लिए ग्लेशियोजेनिक-सीडिंग सफल रही है, जहाँ कुछ परिणामों में वर्षा/हिम में 5-15 % तक वृद्धि देखी गई।
- लेकिन अधिकांश वैज्ञानिक पार्श्व में यह मानते हैं कि यह technique “मॉडेस्ट प्रभाव” देती है और परिणाम मौसम-परिस्थितियों पर बहुत निर्भर होते हैं।
दिल्ली (Delhi) में क्लाउड-सीडिंग का प्रयोग और विफलता-कारक कारण
राजधानी दिल्ली में severe air-pollution (AQI अत्यंत खराब) की पृष्ठभूमि में क्लाउड-सीडिंग को एक आइडिया के रूप में अपनाया गया है — जिसका उद्देश्य है artificial rain द्वारा particulate-matter (PM2.5/PM10) को धरातल पर धो देना तथा वायु-गुणवत्ता (air quality) में अस्थायी सुधार लाना।
पर कुछ मुख्य कारणों से इस प्रयास का परिणाम अभी तक अनिश्चित या विफल रहा है:
विफलता-कारक कारण:
- बादल व नमी की कमी – दिल्ली की सर्दियों में हवा नमी-रहित रहती है, और उपयुक्त नमी व बादल संरचना (cloud thickness, liquid water content) अक्सर उपलब्ध नहीं होती।
- उपयुक्त क्लाउड टाइप का अभाव – ऐसे बादल जिनमें droplet/ice nuclei बनने का पर्याप्त समय व संरचना हो, उनमें अक्सर सीडिंग संभव नहीं होती।
- नीचे सूखी हवा (dry‐layer) का प्रभाव – यदि बादल के नीचे हवा बहुत शुष्क हो, तो बनी हुई बूंदें वाष्पित हो सकती हैं और बारिश धरातल तक नहीं पहुँचती।
- मूल कारणों का नहीं समाना – क्लाउड-सीडिंग सिर्फ वायु-कणों को “धोने” का उपाय है; वाहनों, निर्माण-धूल, कृषि-आग जैसे स्रोतों को नियंत्रण नहीं देती। अतः यदि उत्सर्जन (emissions) कम न हों, तो वायु-गुणवत्ता शीघ्र ही बिगड़ सकती है।
- लागत, लॉजिस्टिक्स व वैज्ञानिक पुख्ता डेटा का अभाव – उड़ान, कीमिकल सेडिंग, real‐time मॉनिटरिंग आदि में खर्च व जटिलता है, और भारत में लंबी अवधि के निरीक्षण (long-term impact) कम मिले हैं।
दिल्ली के प्रयास में इन कारणों के संयोजन ने परिणाम को सीमित कर दिया है।
निष्कर्ष: क्या क्लाउड-सीडिंग समाधान है?
Cloud Seeding एक सपोर्टिंग तकनीक हो सकती है — खासकर जब मौसम व बादल की स्थिति अनुकूल हो — लेकिन इसे एक समग्र एवं दीर्घकालीन समाधान मानना उचित नहीं है। विशेष रूप से दिल्ली जैसे heavily polluted शहरों में:
- यह आंशिक व अस्थायी राहत दे सकता है, लेकिन emissions-control, स्रोत-परिचालन (source-management) व वायु-प्रदूषण नीतियों को त्यागने योग्य विकल्प नहीं है।
- यदि बादलों व नमी की स्थिति अनुकूल नहीं हो, तो तकनीक का परिणाम नगण्य हो सकता है।
- वैज्ञानिक व पर्यावरण-विशेषज्ञ यह चेतावनी देते हैं कि क्लाउड-सीडिंग को “प्रदूषण समस्या का जादुई इलाज” नहीं समझना चाहिए — यह एक मौसम-उपयुक्त उपाय है, जो बेहतर परिणाम तभी देगा जब अन्य प्रदूषण-नियंत्रण कदम सक्रिय हों।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. Cloud Seeding क्या है?
उत्तर : Cloud Seeding एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें बादलों में कुछ रासायनिक कण (जैसे Silver Iodide या Sodium Chloride) छोड़े जाते हैं ताकि बारिश या बर्फबारी को बढ़ाया जा सके। इसका उद्देश्य मौजूदा बादलों से अधिक वर्षा उत्पन्न करना होता है।
Q2. दिल्ली में Cloud Seeding का प्रयास क्यों किया गया था?
उत्तर : दिल्ली सरकार और IIT Kanpur ने मिलकर वायु-प्रदूषण (Air Pollution) कम करने के लिए Cloud Seeding का प्रयोग किया था। Artificial Rain के ज़रिए हवा में मौजूद धूल और प्रदूषक कणों को नीचे गिराने का लक्ष्य था।
Q3. दिल्ली में Cloud Seeding फेल क्यों हुआ?
उत्तर : Cloud Seeding असफल होने का मुख्य कारण था – बादलों में पर्याप्त नमी का न होना, बादल की ऊँचाई और संरचना का अनुकूल न होना, तथा नीचे की हवा का बहुत सूखा (dry layer) होना। इन कारणों से बनी बूंदें धरातल तक नहीं पहुंच पाईं।
Q4. क्या Cloud Seeding पूरी तरह सुरक्षित है?
उत्तर : हाँ, Cloud Seeding में इस्तेमाल होने वाले रसायन (जैसे Silver Iodide या Salt Particles) बहुत कम मात्रा में छोड़े जाते हैं और इन्हें पर्यावरण या मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित माना जाता है।
Q5. क्या Cloud Seeding से वायु-प्रदूषण खत्म किया जा सकता है?
उत्तर : Cloud Seeding अस्थायी राहत दे सकता है क्योंकि बारिश से हवा में मौजूद धूल और कण नीचे गिर जाते हैं, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए स्रोत-स्तर पर कदम उठाने जरूरी हैं।
Q6. क्या भारत में Cloud Seeding पहले भी किया गया है?
उत्तर : हाँ, भारत में महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान और अब दिल्ली जैसे राज्यों में Cloud Seeding के प्रयोग किए गए हैं। कुछ क्षेत्रों में बारिश में 10-25% तक की बढ़ोतरी देखी गई है, लेकिन परिणाम हर बार समान नहीं रहे।
Q7. क्या Cloud Seeding से मौसम बदला जा सकता है?
उत्तर : नहीं, Cloud Seeding नया मौसम नहीं बनाता। यह केवल मौजूदा बादलों की संरचना और नमी का उपयोग करके बारिश को संभव बनाता है। यानी यदि बादल ही न हों, तो Cloud Seeding से कोई असर नहीं होगा।
Q8. भविष्य में भारत में Cloud Seeding की संभावनाएं क्या हैं?
उत्तर : भारत में यह तकनीक अभी परीक्षण-चरण में है। भविष्य में जब मौसम-पूर्वानुमान (Weather Forecasting) और डेटा-एनालिटिक्स और सटीक होंगे, तब Cloud Seeding को सूखा-प्रभावित और प्रदूषण-प्रभावित क्षेत्रों में और प्रभावी रूप से लागू किया जा सकता है।












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