बंगाल में 32 हजार शिक्षकों की नियुक्तियों को बहाल किया गया

कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 32000 शिक्षकों की नियुक्तियों को बहाल किया

नई दिल्ली – 4 दिसंबर 2025 को कलकत्ता उच्च न्यायालय की विभाजन पीठ ने पश्चिम बंगाल में प्राथमिक शिक्षकों की 32,000 नियुक्तियों को बहाल करते हुए एक ऐतिहासिक और विवादास्पद निर्णय दिया है। यह निर्णय साल भर के कानूनी संघर्ष और उम्मीदवारों द्वारा दायर याचिकाओं के बाद आया है।

विवाद की शुरुआत और नकद-के-लिए-नौकरी घोटाला

विवाद की जड़ें 2014 की भर्ती प्रक्रिया में निहित हैं। पश्चिम बंगाल प्राथमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) के माध्यम से कुल 42,500 प्राथमिक शिक्षकों की नियुक्तियां की गई थीं। हालांकि, उम्मीदवारों ने बड़े पैमाने पर अनियमितताएं, विशेष रूप से नकद-के-लिए-नौकरी (cash-for-jobs) के आरोप लगाए, जिसमें कहा गया कि कई शिक्षकों ने पद प्राप्त करने के लिए भुगतान किया था।​

ये अभियोजन 2014 की भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता पर गंभीर सवाल उठाते हैं।​

कानूनी प्रक्रिया और न्यायिक यात्रा

2014 की भर्ती में अनियमितताओं के आरोपों के बाद, उम्मीदवारों ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में याचिकाएं दायर कीं। मामले को पहले किसी अन्य पीठ के समक्ष सुना जा रहा था, लेकिन एक न्यायाधीश के पदत्याग के कारण सुनवाई रुकी। बाद में, मामला विभाजन पीठ को स्थानांतरित किया गया, जिसने अप्रैल 2025 से औपचारिक सुनवाई शुरू की।​

न्यायाधीश अभिजीत गांगुली ने 2023 में एकल पीठ से यह आदेश दिया था कि 32,000 शिक्षकों की नियुक्तियों को रद्द कर दिया जाए क्योंकि भर्ती प्रक्रिया में कथित गंभीर अनियमितताएं थीं।​

विभाजन पीठ का ऐतिहासिक निर्णय

न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति रीतोब्रोत कुमार मित्र की विभाजन पीठ ने कहा है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच ने केवल 264 नियुक्तियों में अनियमितताएं दर्शाई हैं, और उसके बाद केवल 96 शिक्षकों को संदेह की सूची में रखा गया है। इसका अर्थ यह है कि 32,000 की संपूर्ण नियुक्तियों को रद्द करना और पूरी भर्ती प्रक्रिया को शून्य मानना न्यायसंगत नहीं था।​

खंडपीठ के अनुसार, यदि व्यवस्थागत बुराई (systematic malfeasance) थी, तो इसे सबूतों द्वारा समर्थित होना चाहिए था। पीठ ने नोट किया कि 9 साल की सेवा के बाद शिक्षकों की नौकरी छीन लेना उनके और उनके परिवारों के लिए अपार कठिनाई का कारण बन सकता है।​

सर्वोच्च न्यायालय का समानांतर निर्णय

इस साल की शुरुआत में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अलग मामले में पश्चिम बंगाल स्कूल सेवा आयोग द्वारा प्रबंधित 2016 की भर्ती पैनल से 25,000 से अधिक राज्य स्कूल नौकरियों को रद्द करने के आदेश को बरकरार रखा था। यह निर्णय शिक्षा क्षेत्र में भर्ती प्रक्रियाओं की जांच में न्यायालयों की कड़ोर नीति को दर्शाता है।​

2016 की भर्ती प्रक्रिया में भी अनियमितताएं पाई गई थीं, जिससे हजारों शिक्षकों की नौकरियां प्रभावित हुईं।​

शिक्षा क्षेत्र में व्यापक संकट

पश्चिम बंगाल में शिक्षक भर्ती के मामलों से पता चलता है कि भारत के शिक्षा क्षेत्र में गंभीर प्रशासनिक और नैतिक समस्याएं हैं। 2014 और 2016 दोनों ही भर्ती प्रक्रियाओं में अनियमितताएं पाई गई हैं, जो एक पैटर्न को दर्शाता है।​

सरकारी शिक्षा नीतियों और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की तत्काल आवश्यकता है।​

राष्ट्रीय स्तर पर सुधार के प्रयास

इन समस्याओं से निपटने के लिए, भारत सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 लागू की है, जो शिक्षा प्रशासन में सुधार पर केंद्रित है। समग्र शिक्षा योजना को भी राज्यों में शिक्षा गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए और अधिक कड़े मानदंड के साथ लागू किया जा रहा है।​

प्रधानमंत्री स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (PM-SHRI) योजना भी शिक्षकों की भर्ती और प्रशिक्षण को सुव्यवस्थित करने का लक्ष्य रखती है।​

शिक्षकों के अधिकारों का संरक्षण

कलकत्ता उच्च न्यायालय का यह निर्णय शिक्षकों के नौकरी संरक्षण के अधिकारों को मान्यता देता है। 9 साल तक सेवा प्रदान करने के बाद किसी को अचानक नौकरी से निकाल देना न केवल कानूनी रूप से संदिग्ध है, बल्कि सामाजिक रूप से अन्यायपूर्ण भी है।​

हालांकि, कानूनी प्रक्रिया में उचित जांच के बाद, जिन व्यक्तियों को वास्तव में अनियमितताओं में शामिल पाया जाता है, उन्हें दंडित किया जाना चाहिए, लेकिन यह सामूहिक दंड के माध्यम से नहीं।​

भविष्य के निहितार्थ

यह मामला भारतीय न्यायिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है कि सामूहिक दंड वास्तव में व्यक्तिगत अपराध के सबूत के बिना न्यायसंगत नहीं हो सकते।​

राज्य सरकारों को भविष्य में शिक्षक भर्ती प्रक्रियाओं में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही बनाने की आवश्यकता है। शिक्षकों का चयन एकमात्र योग्यता के आधार पर होना चाहिए, न कि किसी अन्य प्रभाव या भुगतान के आधार पर।​

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