हजारीबाग : झारखंड के हजारीबाग जिले में बड़कागांव गांव का माहौल गर्म हो गया जब ग्रामीणों ने गोंदलपुरा अदानी कोल ब्लॉक परियोजना की जनसुनवाई के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया। 20 जनवरी 2026 को प्लस टू हाई स्कूल में आयोजित होने वाली इस जनसुनवाई को ग्रामीणों की भारी एकजुटता के कारण रद्द कर दिया गया।
विरोध प्रदर्शन में ग्रामीणों का भारी तोड़फोड़ और हंगामा
जनसुनवाई स्थल पर ग्रामीणों और विस्थापन विरोधी संगठनों ने आक्रामक तरीके से विरोध मार्च निकाले और जोरदार नारेबाजी की। रिपोर्ट्स के अनुसार ग्रामीणों ने जनसुनवाई को बंद करने की मांग की। विरोध में ग्रामीणों / रैयतों ने आयोजन स्थल पर तोड़फोड़ की । जनसुनवाई के लिए स्थापित सामग्रियों को काफी हद तक क्षतिग्रस्त कर दिया गया।
स्थल पर रखी हजारों कुर्सियां तोड़ दी गईं, पेपर और फाइल्स को अस्त व्यस्त कर दिया गया, प्रशासनिक सेटअप को ध्वस्त कर दिया गया, और जनसुनवाई के लिए लगाए गए बैनर व बैरियर्स भी हटा दिए गए। विरोधकर्ताओं ने प्रिंटर और अन्य आवश्यक सामग्रियों को भी नुकसान पहुंचाया।
ग्रामीणों के मुख्य आरोप – जनसुनवाई असंवैधानिक
ग्रामीणों का मुख्य तर्क यह था कि यह जनसुनवाई संवैधानिक नहीं है। उनका आरोप है कि अदानी प्रबंधन करीब हजारों पुलिस बल की तैनाती के साथ जबरन जनसुनवाई कराने की तैयारी कर रहा था। ग्रामीणों के अनुसार, भारी पुलिस मौजूदगी में यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक नहीं रहती, बल्कि जनता की आवाज दबाने का माध्यम बन जाती है।
विस्थापन की चिंता
गोंदलपुरा कोल ब्लॉक परियोजना से क्षेत्र के हजारों ग्रामीणों का विस्थापन होने की संभावना है। परियोजना के तहत गोंदलपुरा, गाली, बलोदर, हाहे और फुलांग – कुल पांच गांवों में भूमि अधिग्रहण प्रस्तावित है।
यदि यह अधिग्रहण पूरी तरह हो गया, तो कुल 1,721 परिवार प्रभावित होंगे, जिनमें गोंदलपुरा के सबसे अधिक 1,324 परिवार शामिल हैं।
पर्यावरणीय संकट
ग्रामीणों का दावा है कि इस परियोजना से 500 हेक्टेयर से अधिक कृषि भूमि, आवास और जंगल नष्ट होने का खतरा है। इसके अलावा, 229 मिलियन टन ठोस अपशिष्ट निकलने का अनुमान है, जो स्थानीय पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा साबित हो सकता है।
काला दिवस का ऐलान
बड़कागांव के ग्रामीणों ने 20 जनवरी को काला दिवस के रूप में मनाने का ऐलान किया है। यह उनके विरोध की गंभीरता को दर्शाता है और दर्शाता है कि वे इस परियोजना के लिए किसी भी कीमत पर अपनी जमीन नहीं देंगे।
परियोजना की पृष्ठभूमि
गोंदलपुरा कोल ब्लॉक को नवंबर 2020 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू की गई वाणिज्यिक खनन की ई-नीलामी के तहत अदानी एंटरप्राइजेज को आवंटित किया गया था।
परियोजना की विशेषताएं:
- कोयला भंडार: लगभग 176 मिलियन टन
- अनुमानित लागत: लगभग 1 लाख करोड़ रुपये
- वन भूमि: 219.8 हेक्टेयर
- गैर-वन भूमि: 293.38 हेक्टेयर
ग्रामीणों का लंबा विरोध संघर्ष
यह विरोध प्रदर्शन एक दिन की घटना नहीं है। ग्रामीण पिछले दो सालों से निरंतर इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं। 15 जुलाई 2023 से गोंदलपुरा में एक अनवरत धरना लगाया गया है।
विरोध के मील के पत्थर:
- 15 जुलाई 2023: गोंदलपुरा में विरोध आंदोलन शुरू
- 4 अक्टूबर 2024: पुलिस ने अडानी के बैरिकेड्स हटाने की कोशिश कर रहे ग्रामीणों पर गोलियां चलाईं (कोई घायल नहीं)
- 20 जनवरी 2026: तीव्र विरोध और जनसुनवाई रद्द
सरकार और अदानी का दृष्टिकोण
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस परियोजना से क्षेत्र को महत्वपूर्ण लाभ मिलेंगे:
| पहलू | अनुमानित लाभ |
|---|---|
| वार्षिक राजस्व | 600 करोड़ रुपये |
| प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार | 5-10 हजार लोग |
| बिजली आपूर्ति | राष्ट्रीय मांग में वृद्धि |
हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि ये लाभ उनके जीवन, जमीन और पर्यावरण के विनाश की कीमत पर आ रहे हैं।
प्रशासन की चुप्पी
जिला प्रशासन की ओर से अभी तक इस मुद्दे पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ग्रामीणों की मांग है कि जनसुनवाई को तुरंत रद्द किया जाए और ग्रामीणों की सहमति, सुरक्षा और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करते हुए ही कोई आगे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाए।
ग्रामीणों का दृढ़ संकल्प
बड़कागांव के ग्रामीणों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे इस जनसुनवाई को किसी भी हाल में स्वीकार नहीं करेंगे और मरते दम तक इस परियोजना का विरोध जारी रहेगा।
20 जनवरी को दिखी एकजुटता यह साबित करती है कि स्थानीय ग्रामीण और किसान एक मजबूत गठबंधन बना चुके हैं और किसी भी दबाव में अपनी जमीन नहीं देंगे। जहां एक ओर सरकार विकास और रोजगार की बातें करती है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय लोग अपनी परंपरागत जीविका, पर्यावरण और अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ाई दे रहे हैं।
भविष्य की संभावनाएं
इस मुद्दे का भविष्य अभी अनिश्चित है। ग्रामीणों की ताकत के सामने अदानी और सरकार को अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। आने वाले दिनों में इस विवाद के कई महत्वपूर्ण मोड़ आ सकते हैं।
यह घटना भारत में विकास बनाम पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अधिकारों की बहस को फिर से जगाती है।












प्रातिक्रिया दे