ट्रंप का टैरिफ गैरकानूनी — US Supreme Court का ऐतिहासिक फैसला

ट्रंप का टैरिफ गैरकानूनी, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और US Supreme Court भवन

अमेरिकी : अमेरिकी राजनीति और वैश्विक व्यापार जगत के लिए 20 फरवरी 2026 का दिन ऐतिहासिक रहा। अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय (US Supreme Court) ने राष्ट्रपति Donald Trump के बहुप्रतीक्षित और विवादास्पद टैरिफ नीति को एक ऐतिहासिक 6-3 के बहुमत फैसले में गैरकानूनी घोषित कर दिया। यह फैसला ट्रंप की दूसरी पारी की सबसे बड़ी आर्थिक और कानूनी हार मानी जा रही है। मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स द्वारा लिखे गए इस फैसले ने न केवल ट्रंप प्रशासन की नींव हिला दी, बल्कि वैश्विक व्यापार समझौतों और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए।

क्या है पूरा मामला? — IEEPA टैरिफ विवाद की जड़

राष्ट्रपति ट्रंप ने अपनी दूसरी पारी में International Emergency Economic Powers Act (IEEPA) — यानी अंतर्राष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम, 1977 — का सहारा लेकर अमेरिका के लगभग सभी व्यापारिक साझेदार देशों पर भारी-भरकम आयात शुल्क (Import Duties) लगाए थे। इनमें चीन, कनाडा, मेक्सिको समेत दर्जनों देश शामिल थे। ट्रंप का तर्क था कि अमेरिका का व्यापार घाटा, अवैध फेंटानिल ड्रग की तस्करी और राष्ट्रीय सुरक्षा खतरे — ये सभी “राष्ट्रीय आपातकाल” की श्रेणी में आते हैं और इसीलिए वे IEEPA के तहत टैरिफ लगाने के लिए अधिकृत हैं।

28 मई 2025 को अमेरिकी इंटरनेशनल ट्रेड कोर्ट ने सर्वसम्मति से IEEPA टैरिफ को गैरकानूनी करार दे दिया, और 29 अगस्त 2025 को अमेरिकी अपील कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहाँ 5 नवंबर 2025 को मौखिक बहस हुई।

सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला — 6-3 का बहुमत

सुप्रीम कोर्ट की 6-3 बहुमत वाली पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि IEEPA कानून राष्ट्रपति को टैरिफ लगाने का अधिकार नहीं देता। कोर्ट ने माना कि ट्रंप की यह कानूनी व्याख्या राष्ट्रपति के टैरिफ संबंधी अधिकारों का “परिवर्तनकारी विस्तार” होती।

Learning Resources Inc. v. Trump और V.O.S. Selections v. United States — इन दो मामलों में एक साथ यह फैसला सुनाया गया। मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स के साथ जस्टिस सोटोमायोर, कगन, गोरसच, बैरेट और जैक्सन बहुमत में रहे, जबकि जस्टिस थॉमस, कवानॉ और अलिटो ने असहमति जताई।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रंप से पहले किसी भी राष्ट्रपति ने इस कानून का इस्तेमाल टैरिफ लगाने के लिए कभी नहीं किया था। ऐसे असाधारण अधिकार का प्रयोग करने के लिए कांग्रेस की स्पष्ट अनुमति जरूरी होती है — जो इस मामले में थी ही नहीं।

$160 अरब से अधिक के गैरकानूनी टैरिफ — रिफंड का बड़ा संकट

टैक्स फाउंडेशन के अनुसार, 20 फरवरी 2026 तक IEEPA के तहत 160 अरब डॉलर से अधिक के टैरिफ अवैध रूप से वसूले जा चुके थे। अगर यह नीति जारी रहती तो 2026 से 2035 के बीच 1.4 ट्रिलियन डॉलर की वसूली होती।

Penn Wharton Budget Model के अनुसार, रिफंड की कुल राशि 175 अरब डॉलर तक पहुँच सकती है। हजारों कंपनियाँ अब रिफंड के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाएंगी। जस्टिस कवानॉ ने अपनी असहमति में चेताया कि यह रिफंड प्रक्रिया “एक बड़ी उलझन” बन सकती है।

ट्रंप की प्रतिक्रिया — “यह एक शर्मनाक फैसला है”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के कुछ ही घंटों बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने फैसला सुनाने वाले न्यायाधीशों को “शर्म की बात” बताया और एक नई 10% वैश्विक टैरिफ नीति लागू करने की घोषणा की। इस बार उन्होंने Trade Act of 1974 की धारा 122 का सहारा लिया। हालाँकि, विशेषज्ञों का कहना है कि इस धारा के तहत लगाए गए टैरिफ केवल 150 दिनों तक ही लागू रह सकते हैं।

ट्रंप ने फैसले से पहले ही चेतावनी दी थी — उन्होंने लिखा था: “अगर सुप्रीम कोर्ट अमेरिका के खिलाफ फैसला सुनाती है, तो हम बर्बाद हो जाएंगे!”

डेमोक्रेट्स की प्रतिक्रिया — “अमेरिकी परिवारों की जीत”

डेमोक्रेटिक सांसद ब्रेंडन बॉयल ने कहा कि यह फैसला हर उस अमेरिकी परिवार की जीत है जो ट्रंप के टैरिफ टैक्स की वजह से बढ़ती कीमतों की मार झेल रहा था। सांसद रिचर्ड नील ने इसे “अमेरिकी जनता, कानून के राज और वैश्विक अर्थव्यवस्था में हमारी साख की जीत” बताया।

सीनेटर मारिया केंटवेल ने ट्रेजरी सेक्रेटरी से पत्र लिखकर मांग की कि अवैध टैरिफ चुकाने वाले व्यवसायों को जल्द-से-जल्द रिफंड दिया जाए, खासकर उन छोटे और मध्यम उद्योगों को जो दिवालियेपन की कगार पर हैं।

भारत और वैश्विक व्यापार पर असर

यह फैसला केवल अमेरिकी घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है। ट्रंप के टैरिफ के दायरे में भारत भी आता था। IEEPA के तहत भारतीय निर्यातकों पर लगाए गए टैरिफ अब कानूनी रूप से अमान्य हो गए हैं। भारतीय निर्यात उद्योग — खासकर IT, टेक्सटाइल, फार्मास्यूटिकल और इंजीनियरिंग सेक्टर — के लिए यह बड़ी राहत की खबर है। हालाँकि, ट्रंप की नई 10% वैश्विक टैरिफ नीति और Section 232 टैरिफ अभी भी लागू हैं, जिसका असर भारत पर बना रह सकता है।

शेयर बाज़ार पर असर — मामूली उछाल

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अमेरिकी शेयर बाज़ार में मामूली तेजी देखी गई। S&P 500 में करीब 0.5% की बढ़त दर्ज हुई। फर्नीचर कंपनियों के शेयरों में खासी उछाल आई। बाज़ार विशेषज्ञों का मानना है कि अनिश्चितता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है क्योंकि ट्रंप नई टैरिफ नीति के साथ वापस आ सकते हैं।

आगे क्या? — ट्रंप के पास क्या विकल्प बचे हैं?

ट्रंप प्रशासन के पास अब कुछ सीमित विकल्प बचे हैं — Trade Act of 1974 की धारा 301 (जो अनुचित व्यापार प्रथाओं के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति देती है) और Trade Expansion Act of 1962 की धारा 232 (जो राष्ट्रीय सुरक्षा आधार पर टैरिफ लगाने की अनुमति देती है)। लेकिन इन कानूनों के तहत टैरिफ लगाने के लिए लंबी जांच प्रक्रिया से गुजरना होगा — जो कि IEEPA की तरह तत्काल नहीं होगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला भविष्य के राष्ट्रपतियों के आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को भी सीमित करेगा और कार्यपालिका और विधायिका के बीच संतुलन को मज़बूत करेगा।

निष्कर्ष — लोकतंत्र की जीत या आर्थिक उथल-पुथल की शुरुआत?

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निस्संदेह ऐतिहासिक है। एक तरफ जहाँ यह कानून के शासन और संसदीय अधिकारों की जीत है, वहीं दूसरी तरफ $175 अरब के संभावित रिफंड, हजारों कानूनी मामले और ट्रंप की नई टैरिफ नीतियाँ वैश्विक व्यापार में लंबे समय तक अनिश्चितता बनाए रखेंगी। दुनियाभर के देश अब देख रहे हैं कि अमेरिका की नई व्यापार नीति क्या रुख अपनाती है — और इसका असर भारत समेत हर देश पर पड़ेगा।

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