Russian vs Venezuela Oil : भारत के लिए कौन‑सा तेल ज़्यादा फ़ायदेमंद सौदा है?

Russian vs Venezuela Oil : रूस बनाम वेनेज़ुएला तेल: भारत के लिए कौन सस्ता और बेहतर विकल्प। बाएं तरफ रूसी Urals तेल टैंकर रूस का झंडा लहराते हुए, दाएं तरफ वेनेज़ुएला का Merey क्रूड तेल टैंकर वेनेज़ुएला का झंडा लिए।

इस समय भारत की सबसे बड़ी दुविधा Russian vs Venezuela Oil ? भारत के लिए कौन‑सा तेल ज़्यादा फ़ायदेमंद सौदा है? अमेरिका की ओर से रूस पर सख़्त पाबंदियों और रूसी कच्चे तेल की ख़रीद में कटौती के दबाव के बीच भारत के सामने बड़ा सवाल है – भविष्य में सस्ता तेल रूस से लेना जारी रखा जाए या वेनेज़ुएला जैसे विकल्प पर ज़्यादा दांव लगाया जाए। हालिया रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिकी बाज़ार में भारतीय सामानों पर टैरिफ घटाने का प्रस्ताव भी इस शर्त से जोड़ा जा रहा है कि भारत रूसी कच्चे तेल की ख़रीद धीरे‑धीरे बंद करे, जिस वजह से यह बहस और संवेदनशील हो गई है।

इस पृष्ठभूमि में ज़रूरी है कि रूस और वेनेज़ुएला, दोनों से आने वाले कच्चे तेल के दाम, क्वालिटी, लॉजिस्टिक्स और भू‑राजनीतिक जोखिमों की बारीक तुलना की जाए।

1. भारत का रूसी तेल पर दांव: सस्ती डील लेकिन बढ़ता जोखिम

1.1 छूट (डिस्काउंट) और दाम

यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप से मांग घटने पर रूस ने एशियाई खरीदारों – ख़ासकर भारत और चीन – को तेज़ छूट पर Urals ग्रेड कच्चा तेल ऑफ़र करना शुरू किया। 2025 के अंत और 2026 की शुरुआत तक रिपोर्टों में आया कि Urals, ब्रेंट की तुलना में लगभग 7-11 डॉलर प्रति बैरल तक सस्ता ऑफ़र किया गया, जो कम से कम दो साल में सबसे बड़ा डिस्काउंट है।

भारतीय रिफ़ाइनर, ख़ासकर प्राइवेट सेक्टर की कंपनियाँ, इसी भारी डिस्काउंट की वजह से रूसी कच्चे तेल पर ज़ोर देती रही हैं, क्योंकि सस्ता फ़ीडस्टॉक सीधे तौर पर पेट्रोल‑डीज़ल की रिफ़ाइनिंग मार्जिन बढ़ाता है।

1.2 लॉजिस्टिक्स: दूरी कम, डिलीवरी तेज़

  • रूस के फ़ार‑ईस्ट बंदरगाह (जैसे व्लादिवोस्तोक) से भारत तक टैंकर लगभग 24 दिन में पहुंच जाते हैं।
  • अगर रूस का तेल सुयेज़ नहर वाले रूट से आता है तो समय 35–40 दिन तक हो सकता है।

यानी रूस से आपूर्ति अपेक्षाकृत तेज़ और लॉजिस्टिक लागत के मामले में काफ़ी प्रतिस्पर्धी रहती है। यह बात तब और अहम हो जाती है जब ग्लोबल मार्केट में अचानक झटके (जैसे युद्ध या ओपेक+ कटौती) के कारण सप्लाई‑सुरक्षा को लेकर अनिश्चितता बढ़ जाती है।​

1.3 कच्चे तेल की क्वालिटी: रिफ़ाइनिंग के लिए अनुकूल

  • Urals ग्रेड की API ग्रेविटी लगभग 30–32 डिग्री और सल्फ़र 1.3–1.5% के बीच बताई जाती है – यानी यह मीडियम, अपेक्षाकृत “साफ़” कच्चा तेल माना जाता है।
  • इससे पेट्रोल, डीज़ल, ATF जैसे हल्के उत्पाद अच्छी मात्रा में और कम रिफ़ाइनिंग खर्च के साथ निकल जाते हैं।​

भारतीय रिफ़ाइनरियों के मौजूदा कॉनफ़िगरेशन के लिए यह ग्रेड काफ़ी सुविधाजनक है, क्योंकि बहुत ज़्यादा कोकिंग या हाई‑इंटेन्सिटी डीसल्फ़राइजेशन की ज़रूरत नहीं पड़ती।

1.4 भू‑राजनीतिक और प्रतिबंध जोखिम

हालिया महीनों में अमेरिका ने रूस की कुछ बड़ी कंपनियों (जैसे Rosneft, Lukoil आदि) पर और कड़े ऊर्जा प्रतिबंध लगाए, जिसके बाद कई भारतीय रिफ़ाइनर दिसंबर 2025 से रूसी कार्गो बुक करने में हिचकने लगे या ख़रीद घटा दी।

नतीजा यह हुआ कि:

  • रूसी Urals पर डिस्काउंट और बढ़ा, क्योंकि भारत व चीन दोनों की तरफ़ से मांग कुछ नरम हुई।
  • विश्लेषकों का अनुमान है कि भारतीय आयात पहले के लगभग 20 लाख बैरल प्रति दिन से घटकर 8–10 लाख बैरल प्रतिदिन की रेंज में आ सकते हैं।

यानी आर्थिक तौर पर डील आकर्षक है, लेकिन क़ानूनी‑वित्तीय जोखिम (सेकेंडरी सैंक्शन, पेमेंट चैनल, बीमा आदि) लगातार बढ़ रहे हैं।

2. वेनेज़ुएला का तेल: रिफ़ाइनरियों के अनुकूल, लेकिन बहुत अस्थिर

2.1 भारत‑वेनेज़ुएला: उतार‑चढ़ाव भरा रिश्ता

  • 2018–2020 के बीच वेनेज़ुएला भारत के शीर्ष छह तेल सप्लायरों में था और कुछ सालों में भारत की कुल क्रूड बास्केट का क़रीब 7% हिस्सा सिर्फ़ वेनेज़ुएलन तेल से आता था।​
  • 2019–20 के बाद अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को आयात लगभग बंद करने पड़े; 2022 में तो वेनेज़ुएला से आयात शून्य के स्तर पर आ गया।
  • 2023 के अंत में अमेरिका ने अस्थायी तौर पर सैंक्शन ढीले किए तो भारत ने दोबारा कुछ कार्गो लेना शुरू किया और 2023–24 व 2024–25 में आयात में अस्थायी उछाल देखा गया।
  • लेकिन 2025 में प्रतिबंध दोबारा कड़े होने और कैरिबियन क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक सक्रियता बढ़ने के बाद भारत की वेनेज़ुएला से आयात फिर से जोखिम में पड़ गई और कई रिफ़ाइनरियों ने ख़रीद रोक दी।

मतलब, वेनेज़ुएला से सप्लाई राजनीतिक फ़ैसलों पर बहुत ज़्यादा निर्भर है और लंबे समय की स्थिर योजना बनाना मुश्किल हो जाता है।

2.2 कच्चे तेल की क्वालिटी: रिफ़ाइनरी‑अनुकूल लेकिन महंगा प्रोसेसिंग

वेनेज़ुएला के प्रमुख एक्सपोर्ट ग्रेड जैसे Merey‑16 को “हैवी” या “एक्स्ट्रा‑हैवी” क्रूड माना जाता है:

  • API ग्रेविटी लगभग 16 डिग्री,
  • सल्फ़र कंटेंट 2.5–3.4% तक,
    जिससे यह काफ़ी गाढ़ा, सल्फ़र‑समृद्ध और प्रोसेस करने में मुश्किल फ़ीडस्टॉक बन जाता है।

भारत की कई कॉम्प्लेक्स रिफ़ाइनरियाँ (जैसे Reliance, HPCL‑Mittal, कुछ IOC प्लांट) ऐसे भारी और खट्टे (sour) क्रूड को प्रभावी ढंग से प्रोसेस करने में सक्षम हैं और उत्पाद मिक्स के हिसाब से यह उनके लिए फ़ायदेमंद भी हो सकता है।

लेकिन कठिनाई यह है कि:

  • ऐसे तेल को प्रोसेस करने के लिए ज़्यादा ऊर्जा, बड़ी मात्रा में हाइड्रोजन, विस्तृत कोकिंग और भारी डीसल्फ़राइजेशन की ज़रूरत पड़ती है।
  • कई बार इसे पतले (लाइट) क्रूड के साथ ब्लेंड करना पड़ता है, जिससे वास्तविक लागत बढ़ जाती है।​

2.3 दाम और नेट‑बैक इकॉनॉमिक्स

कुछ विश्लेषणों के अनुसार:

  • वेनेज़ुएला का भारी तेल सतही तौर पर और भी सस्ता दिखता है (क़रीब 51 डॉलर प्रति बैरल जैसी क़ीमतें उद्धृत की गई हैं),
  • लेकिन लंबी शिपिंग दूरी, ऊंचा बीमा‑रिस्क, डायल्यूअंट की ज़रूरत और अतिरिक्त रिफ़ाइनिंग लागत को समायोजित करने के लिए इसे ब्रेंट के मुक़ाबले 10–12 डॉलर प्रति बैरल ज़्यादा डिस्काउंट पर बेचना पड़ता है, तभी नेट‑बैक भारतीय रिफ़ाइनर के लिए रूसी Urals जैसा या उससे बेहतर बन पाता है।

यानी “हैडलाइन प्राइस” कम दिखने के बावजूद असली फ़ायदा तभी है जब बहुत भारी डिस्काउंट मिले – जो हर समय संभव नहीं होता।

2.4 दूरी और समय: लगभग दोगुनी यात्रा

  • वेनेज़ुएला से भारत तक टैंकरों को अटलांटिक और हिंद महासागर पार करते हुए लगभग 45–50 दिन लगते हैं।
  • यह समय रूस के फ़ार‑ईस्ट रूट (24 दिन) या सुयेज़ रूट (35–40 दिन) की तुलना में कहीं ज़्यादा है।

लंबी दूरी का मतलब:

  • वर्किंग कैपिटल ज़्यादा समय के लिए फँसा रहना,
  • फ़्रेट और बीमा लागत अधिक होना,
  • सप्लाई चेन में व्यवधान की संभावना बढ़ना।

हालाँकि वेनेज़ुएला अक्सर बहुत बड़ी VLCC (Very Large Crude Carrier) टैंकरों का इस्तेमाल करता है, जो एक बार में 20 लाख बैरल तक ले जा सकते हैं – यानी एक वेनेज़ुएलन कार्गो दो सामान्य रूसी टैंकर के बराबर कच्चा तेल ला सकता है, जिससे कुछ हद तक दूरी की कमी की भरपाई हो जाती है।

3. रूसी बनाम वेनेज़ुएला तेल (Russian vs Venezuela Oil ): मुख्य बिंदुओं की तुलना

(क) दाम और डिस्काउंट

  • रूसी Urals: फिलहाल ब्रेंट की तुलना में 7–11 डॉलर प्रति बैरल तक डिस्काउंट की रिपोर्ट, जो भारत के लिए बेहद आकर्षक है।
  • वेनेज़ुएला: हैडलाइन प्राइस कम, लेकिन लंबी दूरी और भारी प्रोसेसिंग कॉस्ट की भरपाई के लिए 10–12 डॉलर/बैरल तक अतिरिक्त डिस्काउंट की ज़रूरत पड़ सकती है।

(ख) क्वालिटी और रिफ़ाइनिंग

  • रूसी तेल: मीडियम, अपेक्षाकृत कम सल्फ़र वाला – ज़्यादातर भारतीय रिफ़ाइनरियों के लिए “आसान” फ़ीडस्टॉक।
  • वेनेज़ुएला: बहुत भारी, उच्च सल्फ़र – सिर्फ़ हाई‑कॉम्प्लेक्स रिफ़ाइनरियाँ ही इसे लाभकारी ढंग से प्रोसेस कर पाती हैं।

(ग) लॉजिस्टिक्स

  • रूस से डिलीवरी समय: 24–40 दिन (रूट के आधार पर)।
  • वेनेज़ुएला से डिलीवरी समय: 45–50 दिन, यानी लगभग दोगुना।

(घ) भू‑राजनीतिक जोखिम

  • रूस: पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते लगातार बढ़ता क़ानूनी‑वित्तीय दबाव, सेकेंडरी सैंक्शन का डर, लेकिन रूस स्वयं भी “सस्ता बेचकर भी ज़्यादा मात्रा” वाली रणनीति पर टिका हुआ है, इसलिए डिस्काउंट मिलने की संभावना काफ़ी बनी रहती है।
  • वेनेज़ुएला: अमेरिकी नीति के उतार‑चढ़ाव पर पूरी तरह निर्भर; कभी पूरी छूट, कभी अचानक कड़े प्रतिबंध – भारत ने पिछले कुछ सालों में आयात शून्य से लेकर मज़बूत रिकवरी और फिर से गिरावट तक सब देखा है।

4. भारत के लिए व्यावहारिक रणनीति: ‘या तो‑या’ नहीं, ‘संतुलित टोकरी’

4.1 सिर्फ़ रूस या सिर्फ़ वेनेज़ुएला – दोनों ही जोखिम भरे

  • अगर भारत पूरी तरह रूसी तेल पर निर्भर हो जाए, तो भविष्य में और कड़े पश्चिमी प्रतिबंध या पेमेंट चैनलों पर रोक लगने की सूरत में सप्लाई‑सुरक्षा पर बड़ा झटका लग सकता है।
  • अगर भारत वेनेज़ुएला पर ज़्यादा झुकाव दिखाए, तो अमेरिकी नीति के एक फ़ैसले से ही पूरे मॉडल पर पानी फिर सकता है – ठीक वैसा जैसा 2019–20 और फिर 2024–25 के बीच हुआ।

इसलिए ऊर्जा‑सुरक्षा की दृष्टि से दोनों पर “ओवर‑डिपेंडेंस” सही नहीं।

4.2 कहाँ रूस स्पष्ट रूप से आगे है?

  • निकट‑मध्यम अवधि में शिपिंग समय, लॉजिस्टिक्स, रिफ़ाइनिंग लागत और मौजूदा छूट को जोड़कर देखें तो अधिकांश भारतीय रिफ़ाइनरियों के लिए रूसी Urals अधिक व्यावसायिक रूप से आकर्षक सौदा है।
  • हल्का‑मध्यम ग्रेड होने से उत्पाद‑यील्ड बेहतर रहती है और अतिरिक्त हाइड्रोजन/ऊर्जा की ज़रूरत कम पड़ती है, जिससे रिफ़ाइनरी की मार्जिन सुधरती है।​

4.3 जहाँ वेनेज़ुएला को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता

  • भारतीय कंपनियों ने वेनेज़ुएला के तेलक्षेत्रों में निवेश भी किया हुआ है; ONGC Videsh जैसी कंपनियों के लिए वहां की स्थिरता का सीधा वित्तीय महत्व है।
  • भारी व खट्टे तेल को प्रोसेस करने में सक्षम कॉम्प्लेक्स रिफ़ाइनरियाँ (खासकर प्राइवेट सेक्टर) के लिए वेनेज़ुएलन क्रूड, सही डिस्काउंट मिलने पर, प्रॉफिट बढ़ाने का अच्छा ज़रिया हो सकता है।
  • लंबे समय में अगर अमेरिका‑वेनेज़ुएला के बीच किसी स्थायी समझौते से सैंक्शन का जोखिम घटे, तो भारत के लिए यह एक मज़बूत डाइवर्सिफ़ाइड सप्लायर बन सकता है।

निष्कर्ष: भारत के हित में क्या है?

अगर मौजूदा परिस्थितियों, ताज़ा दामों और सप्लाई‑रूट को ध्यान में रखा जाए तो:

  • निकट भविष्य में शुद्ध व्यावसायिक और लॉजिस्टिक दृष्टि से रूसी तेल, वेनेज़ुएला की तुलना में ज़्यादा फ़ायदेमंद सौदा दिखता है – कम डिलीवरी समय, बेहतर क्वालिटी और मज़बूत डिस्काउंट के कारण।
  • वेनेज़ुएला भारतीय रिफ़ाइनरियों के लिए “पूरक” विकल्प होना चाहिए, विकल्प नहीं – यानी जब भी सैंक्शन ढीले हों और डिस्काउंट इतना आकर्षक हो कि लंबी दूरी और भारी रिफ़ाइनिंग लागत की पूरी भरपाई हो जाए, तब कुछ हद तक खरीद बढ़ाई जा सकती है, लेकिन इसे मुख्य स्तंभ बनाना अभी व्यावहारिक नहीं दिखता।

आख़िर में भारत की ऊर्जा‑रणनीति के लिए सबसे विवेकपूर्ण रास्ता यही होगा कि:

  • रूसी छूट का लाभ लेते हुए,
  • वेनेज़ुएला सहित अन्य स्रोतों (मध्य‑पूर्व, अमेरिका, अफ़्रीका) से भी सीमित लेकिन स्थिर मात्रा में तेल लेकर,
  • एक बहु‑स्रोत, balanced crude oil basket तैयार की जाए,

ताकि किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से बचा जा सके और बदलती भू‑राजनीतिक स्थितियों के बीच भारत अपनी ऊर्जा‑सुरक्षा और आर्थिक हित – दोनों को संतुलित रख सके।

FAQs

Q1. भारत के लिए रूसी तेल या वेनेज़ुएला तेल – कौन सस्ता है?

Ans: रूसी Urals तेल ब्रेंट से 7-11 डॉलर/बैरल सस्ता मिल रहा है, जबकि वेनेज़ुएला का भारी तेल सस्ता दिखता है लेकिन शिपिंग और रिफाइनिंग लागत जोड़ने पर महंगा पड़ता है। निकट अवधि में रूसी तेल ज्यादा फायदेमंद।

Q2. रूस से तेल भारत कितने दिनों में पहुंचता है?

Ans: रूस के फार-ईस्ट रूट से 24 दिन, सूएज रूट से 35-40 दिन लगते हैं। यह वेनेज़ुएला (45-50 दिन) से तेज है, जिससे लॉजिस्टिक्स कॉस्ट कम रहती है।

Q3. वेनेज़ुएला का तेल रूस के तेल से भारी क्यों माना जाता है?

Ans: वेनेज़ुएला का Merey क्रूड API ग्रेविटी 16° और सल्फर 2.5-3.4% वाला हैवी-सॉर तेल है, जबकि रूसी Urals मीडियम (API 30-32°) और कम सल्फर वाला। वेनेज़ुएला को प्रोसेस करने में ज्यादा खर्च।

Q4. US सैंक्शन से भारत का रूसी तेल आयात प्रभावित हुआ?

Ans: हां, 2025-26 में रूसी आयात 20 लाख से घटकर 8-12 लाख बैरल/दिन हो गया। डिस्काउंट बढ़ा लेकिन पेमेंट-बीमा जोखिम बढ़े। वेनेज़ुएला पर भी सैंक्शन उतार-चढ़ाव प्रभावित करते हैं।

5. भारत रूस से कितना कच्चा तेल आयात करता है?

Ans: 2025 तक रूस भारत का सबसे बड़ा सप्लायर था (कुल आयात का 30-40%)। हालिया कटौती के बाद हिस्सा घटा, लेकिन डिस्काउंट के कारण अभी भी आकर्षक।

Q6. वेनेज़ुएला तेल रिफाइन करने में रूसी तेल से ज्यादा खर्च क्यों?

Ans: हैवी क्रूड के लिए ज्यादा हाइड्रोजन, कोकिंग और डिसल्फराइजेशन चाहिए। रिलायंस जैसी कॉम्प्लेक्स रिफाइनरियां इसे हैंडल कर सकती हैं, लेकिन सामान्य रिफाइनरियों के लिए रूसी तेल आसान।

Q7. भारत को रूसी तेल बंद करके वेनेज़ुएला तेल क्यों न खरीदें?

Ans: वेनेज़ुएला सप्लाई US नीति पर निर्भर (2019-25 में शून्य हो चुका), दूरी दोगुनी, और रिफाइनिंग महंगी। रूस स्थिर और सस्ता सौदा देता है।

Q8. भारत की तेल खरीद रणनीति क्या होनी चाहिए?

Ans: Multi-source Basket: रूस से मुख्य सप्लाई, वेनेज़ुएला/मिडिल ईस्ट से पूरक। इससे ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी और एक देश पर निर्भरता कम होगी।

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