चाबहार बंदरगाह: रणनीतिक स्वायत्तता और आर्थिक व्यावहारिकता के बीच भारत की कठिन डगर

चाबहार बंदरगाह का मानचित्र जो भारत की रणनीतिक स्वायतत्ता और ईरान के साथ संबंधों को दर्शाता है

नई दिल्ली – अमेरिकी प्रतिबंधों के दबाव में चाबहार बंदरगाह से भारत के रणनीतिक तौर पर पीछे हटने से एक बार फिर उस कठिन वास्तविकता को उजागर किया है जिसमें भारत को अपनी विदेश नीति की स्वायत्तता और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है। ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण इस बंदरगाह पर भारत के दशकों पुराने सपने अब अमेरिका के साथ 86 अरब डॉलर के व्यापारिक संबंधों की रक्षा की कीमत पर ठंडे बस्ते में डाले जा रहे हैं।

रणनीतिक महत्व बनाम आर्थिक वास्तविकता

विदेश मंत्रालय द्वारा पुष्टि की गई जानकारी के अनुसार, अमेरिकी वित्त विभाग ने 28 अक्टूबर 2025 को एक शर्तीय प्रतिबंध छूट पत्र जारी किया था, जो 26 अप्रैल 2026 तक वैध है। इसके बावजूद, भारत सरकार ने भारतीय बंदरगाह वैश्विक लिमिटेड (आईपीजीएल) के निदेशक को हटाकर कंपनी की वेबसाइट बंद करने जैसे असामान्य कदम उठाए हैं।​

विदेश नीति के जानकारों का मानना है कि यह निर्णय केवल प्रतिबंधों से बचने की रणनीति नहीं, बल्कि एक गहरी गणितीय सोच का परिणाम है। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए केवल एक व्यापारिक परियोजना नहीं, बल्कि पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच का एकमात्र समुद्री मार्ग है। इसके जरिए भारत ने अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) को मजबूत करने की योजना बनाई थी।

आर्थिक दांव कितना बड़ा?

विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. सुनील अमृत कहते हैं, “चाबहार परियोजना भारत की ‘अधिनायकविहीन’ विश्व व्यवस्था की परिकल्पना का प्रतीक थी, जहां वह पश्चिमी दबावों से मुक्त होकर अपने रणनीतिक हितों का पालन कर सकता था। लेकिन जब 86 अरब डॉलर के व्यापारिक हितों और 4.8% बेरोजगारी दर वाली अर्थव्यवस्था का सवाल आता है, तो निर्णय कठिन हो जाता है।”

वास्तव में, भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों में 2025 में 15% की वृद्धि हुई है, जिसमें तकनीकी सेवाओं, रक्षा उपकरणों और ऊर्जा क्षेत्र का बड़ा योगदान है। इसके विपरीत, ईरान के साथ व्यापार मात्र 2.5 अरब डॉलर तक सीमित हो गया है, जो 2018 के पूर्व-प्रतिबंध स्तर से 70% कम है।​

सरकार की ‘जीरो एक्सपोजर’ रणनीति

सूत्रों के अनुसार, भारत सरकार ने ‘जीरो एक्सपोजर’ नीति अपनाते हुए चाबहार संचालन की जिम्मेदारी पूरी तरह ईरानी कर्मचारियों को सौंप दी है। इसके पीछे तर्क स्पष्ट है – बंदरगाह का संचालन जारी रहे लेकिन भारतीय राज्य संस्थाओं की प्रत्यक्ष भागीदारी न होने से प्रतिबंधों का जोखिम कम हो जाएगा।

विदेश मंत्रालय ने सभी भारतीय नागरिकों को ईरान यात्रा से बचने और वहां मौजूद लोगों को वाणिज्यिक उड़ानों से वापस लौटने की सलाह दी है। यह सलाह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईरान में जारी विरोध प्रदर्शनों के बीच अमेरिका सैन्य हस्तक्षेप पर विचार कर रहा है।​

रणनीतिक स्वायत्तता की कीमत

रक्षा विश्लेषक मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) एस.के. सिंह बताते हैं, “चाबहार से पीछे हटना केवल एक बंदरगाह खोने जैसा नहीं है। यह भारत की क्षमता का प्रतीक है कि वह अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों के लिए स्वतंत्र रूप से बुनियादी ढांचा विकसित कर सकता है। इसे खोना मतलब चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (सीपीईसी) के सामने एकतरफा समर्पण जैसा है।”

वास्तव में, चीन ने ग्वादर बंदरगाह पर 62 अरब डॉलर का निवेश करके पाकिस्तान को अपना आर्थिक उपग्रह बना लिया है। भारत का चाबहार निवेश मात्र 500 मिलियन डॉलर था, लेकिन इसकी रणनीतिक कीमत बहुत अधिक थी।

चाबहार से पीछे हटना एक संतुलित और समझदारी का फैसला

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत ने अस्थायी रूप से चाबहार से पीछे हटकर एक समझदारी भरा मार्ग चुना है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं, “यह पूर्ण समर्पण नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्गठन है। अप्रैल 2026 तक की छूट का मतलब है कि भारत अभी भी विकल्प खुले रखना चाहता है।”

भारत ने इस दौरान ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद बनाए रखा है और संकेत दिया है कि वह अमेरिका के साथ सतत वार्ता में रहकर एक दीर्घकालिक समाधान खोजने की कोशिश करेगा। इस बीच, ईरानी कर्मचारियों के माध्यम से संचालन जारी रखने से बंदरगाह की कार्यक्षमता बनी रहेगी और भविष्य में स्थिति सामान्य होने पर भारत वापसी कर सकता है।

निष्कर्ष: बहुध्रुवीय विश्व में भारत की चुनौती

चाबहार पर निर्णय उस व्यापक चुनौती का प्रतीक है जिसका सामना भारत को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में करना पड़ रहा है। एक ओर अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी, तकनीकी सहयोग और व्यापारिक हित हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क और ऐतिहासिक संबंध हैं।

जैसा कि विदेश नीति विशेषज्ञ डॉ. हर्ष वी. पंत कहते हैं, “21वीं सदी का भारत अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए लचीला और व्यावहारिक बनना सीख रहा है। चाबहार से अस्थायी पीछे हटना हार नहीं, बल्कि एक परिपक्व राष्ट्र की पहचान है जो अपनी ताकत और कमजोरी दोनों को समझता है।”

इस घटना ने स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में भारत को अपनी विदेश नीति में आर्थिक व्यावहारिकता और रणनीतिक स्वायत्तता के बीच एक नए प्रकार के संतुलन की खोज करनी होगी, जहां दोनों को एक साथ आगे बढ़ाया जा सके।


संपादकीय नोट: यह खबर भारत की उभरती हुई विदेश नीति चुनौतियों को रेखांकित करती है। समाचार संकलन के दौरान विभिन्न सरकारी सूत्रों, विदेश नीति विशेषज्ञों और सार्वजनिक रिकॉर्ड का सहारा लिया गया है।

Comments

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *