नई दिल्ली: संसद के शीतकालीन सत्र के पांचवें दिन शुक्रवार को लोकसभा में एक ऐसा बिल पेश किया गया जो देश के करोड़ों कर्मचारियों के लिए राहत भरी खबर लेकर आया है। एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले द्वारा प्रस्तुत राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025 (Right to Disconnect Bill 2025) के जरिए अब कर्मचारियों को ऑफिस के बाद बॉस के कॉल और ईमेल से मुक्ति मिल सकेगी।
क्या है राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025?
यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है जिसका मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों को ऑफिस टाइमिंग के बाद काम से संबंधित किसी भी तरह के डिजिटल दबाव से बचाना है। बिल के मुताबिक, अब कोई भी कर्मचारी ऑफिशियल टाइम के बाद काम से जुड़े कॉल, ईमेल या मैसेज को इग्नोर करने का अधिकार रखेगा। इसके लिए उस पर कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकेगी।
मुख्य प्रावधान
1. कर्मचारियों का डिस्कनेक्शन अधिकार
बिल में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि हर कर्मचारी को ऑफिशियल वर्किंग आवर्स और छुट्टियों के दौरान काम से संबंधित कॉल और ईमेल को मना करने का पूर्ण अधिकार होगा। इस दौरान यदि कंपनी की तरफ से कोई दबाव या अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाती है, तो वह गैरकानूनी मानी जाएगी।
2. एंप्लॉयीज वेलफेयर अथॉरिटी का गठन
बिल में एक एंप्लॉयीज वेलफेयर अथॉरिटी बनाने का प्रावधान है। यह संस्था डिजिटल कम्युनिकेशन टूल्स के इस्तेमाल पर निगरानी रखेगी और कर्मचारियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए बेसलाइन स्टडीज करेगी।
3. ओवरटाइम के लिए मुआवजा
10 से ज्यादा कर्मचारियों वाली कंपनियों को यूनियन या कर्मचारी प्रतिनिधियों के साथ ओवरटाइम के नियमों पर बातचीत करनी होगी। यदि कोई कर्मचारी ऑफिशियल टाइमिंग के बाद काम करता है, तो उसे नॉर्मल वेज रेट के हिसाब से ओवरटाइम का भुगतान करना होगा।
4. मेंटल हेल्थ सपोर्ट सिस्टम
बिल में कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य का भी खास ख्याल रखा गया है। इसके तहत:
- काउंसलिंग सेवाएं उपलब्ध कराई जाएंगी
- डिजिटल डिटॉक्स सेंटर्स की स्थापना होगी
- कर्मचारियों को डिजिटल दबाव से मुक्ति पाने के लिए विशेष सेशन आयोजित किए जाएंगे
5. उल्लंघन पर जुर्माना
यदि कोई कंपनी बिल के नियमों का पालन नहीं करती है, तो उसे कर्मचारियों को दिए गए कुल वेतन का 1% जुर्माना देना होगा।
क्यों जरूरी था यह बिल?
बिल में पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, भारत की 51% से ज्यादा वर्कफोर्स हर हफ्ते 49 घंटे से अधिक काम करती है। वहीं, 78% कर्मचारी बर्नआउट (mental exhaustion) का शिकार हैं। लगातार काम से जुड़े संदेशों की निगरानी से “इंफो-ओबेसिटी” की समस्या पैदा हो रही है, जिससे कर्मचारियों के दिमाग पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है।
सुप्रिया सुले का तर्क
बिल पेश करते हुए सांसद सुप्रिया सुले ने कहा कि डिजिटल युग में वर्क लाइफ और पर्सनल लाइफ के बीच की सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं। इससे कर्मचारियों में टेलीप्रेशर, नींद की कमी, इमोशनल एक्जॉस्ट और स्ट्रेस से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं। इसलिए इस तरह के कानून की सख्त जरूरत थी।
बिल की मंजूरी की संभावना
यह एक प्राइवेट मेंबर बिल है, जिसे गैर-मंत्री सांसद ने पेश किया है। भारत में ऐसे बिलों के कानून बनने की संभावना बेहद कम होती है। आमतौर पर सरकार अपना जवाब देने के बाद इन्हें वापस ले लिया जाता है। हालांकि, इस बिल ने कर्मचारी कल्याण और वर्क लाइफ बैलेंस पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है।
विशेषज्ञों की राय
ह्यूमन रिसोर्स एक्सपर्ट्स का मानना है कि यदि यह बिल कानून बन जाता है, तो यह भारतीय कॉर्पोरेट कल्चर में बड़ा बदलाव लाएगा। कंपनियों को अपनी पॉलिसीज में बड़े बदलाव करने होंगे और कर्मचारियों के मेंटल हेल्थ पर ज्यादा फोकस करना होगा।
वैश्विक संदर्भ
भारत से पहले कई यूरोपीय देशों में इस तरह के कानून पहले से लागू हैं। फ्रांस, स्पेन, बेल्जियम और आयरलैंड जैसे देशों में कर्मचारियों को ऑफिस के बाद काम से डिस्कनेक्ट होने का कानूनी अधिकार पहले से ही मिला हुआ है।
अगले कदम
अब इस बिल पर संसद में चर्चा होगी और सरकार की तरफ से आधिकारिक जवाब आएगा। यदि सरकार इसे समर्थन देती है, तो यह एक ऐतिहासिक कानून बन सकता है। फिलहाल, यह बिल कर्मचारियों के अधिकारों के लिए एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में देखा जा रहा है।












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